जब से नरेंद्र मोदी सरकार केंद्र में सत्तासीन हुई है, तब से शासन संचालन के परंपरागत ढर्रे से हट कर कार्य संस्कृति देश में दिखी है. चाहे नौकरशाहों से मोदी का तालमेल हो या मंत्रियों द्वारा मनमानी से अपने रिश्ते-नातेदारों को सचिव इत्यादि रखने का मामला हो. अभी मोदी सरकार द्वारा विभिन्न केंद्रीय विश्वविद्यालयों और पेशेवर संस्थानों में विभिन्न अकादमिक नियुक्तियों पर मोदी की विपक्ष आलोचना कर रहा है.
कई संघ-भाजपा विरोधी पत्रकार और मीडिया घराना इसे भगवाकरण का नाम दे रहे हैं. यह समझ में नहीं आता कि क्या वर्तमान मोदी सरकार देश की अकेली सरकार है, जिसने विभिन्न संस्थाओं में अपने पसंद के अधिकारियों की नियुक्ति की है? नयी सरकार के आने से ऐसी नियुक्तियां पुरानी परंपरा है. मोदी सरकार ने ऐसी नियुक्ति करके कोई नयी शुरुआत नहीं की है.
पिछले 67 सालों के इतिहास में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर नजर डालें, तो स्पष्ट होता है कि प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक के कार्यकाल में भी शासक अपनी पसंद के अधिकारियों को विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संगठनों में लाभकारी पदों पर बैठाते रहे हैं.
गौर से देखा जाये, तो इसकी शुरुआत सबसे पहले कांग्रेस ने ही की है. जिन लोगों को लगता है इन नियुक्तियों से मोदी सरकार संस्थाओं में नियंत्रण स्थापित करना चाहती है, तो ऐसे लोगों को दुर्भावना से ग्रसित सोच को दुरुस्त करने की जरूरत है.
अतीत में भी झांकने की जरूरत है, जहां ऐसी राजनीति का भरण-पोषण की शुरुआत हुई. आलोचकों को पसंद की नियुक्तियों पर आलोचना करने के पहले देश के विकास पर ध्यान देना चाहिए.
नारायण कैरो, लोहरदगा
