‘गुरु ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:, गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:.’ भारत में शिक्षकों के प्रति यह सम्मान सांस्कृतिक और पारंपरिक तौर पर भाव और भावना से जुड़ा है. यह बात अलग है कि आज इसका व्यावहारिक स्वरूप समाप्त होता जा रहा है. अब इसका केवल सैद्धांतिक रूप ही अमल में रह गया है.
यह वही देश है, जहां एक ओर गुरुओं को सैद्धांतिक रूप से देवतुल्य समझा जाता है, लेकिन व्यावहारिक रूप में उन्हें वेतन पाने के लिए महीनों तक संघर्ष करना पड़ता है. कई बार तो उन्हें अपना वाजिब हक और मेहनत की कमाई पाने के लिए आमरण अनशन तक करना पड़ता है. एक सरकारी अधिकारी को रहने-खाने और खानसामे तक की सुविधा दी जाती है, लेकिन शिक्षक खुद की कमाई से भी कई महीनों तक महरूम रह जाते हैं. सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए.
संजय भट्ट, भवनाथपुर, गढ़वा
