संस्कृत भारतीय संस्कृति का मूल है

यह खुशी की बात है कि सरकार संस्कृत के विस्तार को लेकर गंभीर है. हाल ही में, थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में 16वें अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का आयोजन किया गया.इसमें कई विद्वानों का समागम हुआ. संस्कृत भाषा के विविध पहलुओं पर मंथन हुआ. संस्कृत में भारतीय उपमहाद्वीपीय संस्कृति की जड़े हैं. इसमें ऋ षियों द्वारा […]

यह खुशी की बात है कि सरकार संस्कृत के विस्तार को लेकर गंभीर है. हाल ही में, थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में 16वें अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का आयोजन किया गया.इसमें कई विद्वानों का समागम हुआ. संस्कृत भाषा के विविध पहलुओं पर मंथन हुआ. संस्कृत में भारतीय उपमहाद्वीपीय संस्कृति की जड़े हैं.
इसमें ऋ षियों द्वारा अन्वेषित ज्ञान-विज्ञान का संपूर्ण खजाना है. संस्कृत का सवाल सिर्फ एक भाषा का नहीं है, बल्कि इसका संबंध राष्ट्रीय अस्मिता, गौरव, इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के परिचय से है. यह हम सब भारतवासियों की साझी विरासत है. इस अर्थ में यह स्थानीयता के आग्रह से पार जाती है.
अंगरेजों द्वारा इसे मृत भाषा घोषित किया जाना और आजादी के बाद भी इसे लेकर उदासीनता दुर्भाग्यपूर्ण है. भारतीय व कई यूरोपीय भाषाओं की जननी को मृत कहना एक विपुल ज्ञान-कोष के साथ मजाक है.
मनोज आजिज, जमशेदपुर

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