नये शीतयुद्ध की पदचाप की आहट

पुष्पेश पंत वरिष्ठ स्तंभकार इस घड़ी माहौल कमोबेश वैसा ही है, जैसा शीतयुद्ध के तनाव भरे बरसों में था. इकोनॉमिस्ट जैसी पत्रिकाएं यह अटकल लगाने लगी हैं कि क्या आज अमेरिका की पारंपरिक सैन्य शक्ति इस नयी रस्साकशी में उसके बैरियों का मुकाबला करने लायक है? पिछले कई महीनों से अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का विश्लेषण करनेवालों […]

पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
इस घड़ी माहौल कमोबेश वैसा ही है, जैसा शीतयुद्ध के तनाव भरे बरसों में था. इकोनॉमिस्ट जैसी पत्रिकाएं यह अटकल लगाने लगी हैं कि क्या आज अमेरिका की पारंपरिक सैन्य शक्ति इस नयी रस्साकशी में उसके बैरियों का मुकाबला करने लायक है?
पिछले कई महीनों से अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का विश्लेषण करनेवालों का ध्यान मुख्यत: पश्चिम एशिया की तरफ ही लगा रहा है.कट्टरपंथी इसलामी संगठन आइएसआइएस की बढ़ती ताकत ने लगभग सभी यूरोपीय देशों के लिए अभूतपूर्व गंभीर संकट पैदा कर दिया है. अभूतपूर्व इसलिए कि ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के गोरे नागरिक ईसाई धर्म तज कर इसलाम कबूल कर बगदादी की नयी खिलाफत के नये निजाम की स्थापना के लिए कुर्बानी देने के लिए कमर कसते नजर आ रहे हैं. दिक्कत यह है कि कुर्बानी के जज्बे के साथ खूंखार दहशतगर्दी के तेवर भी जुड़े हैं. संकट गंभीर इसलिए है कि यह सिर्फ किसी एक राज्य की सुरक्षा के लिए जोखिम नहीं.
जब एक देश के नागरिक दूसरे देश की जमीन पर तीसरे देश के नागरिकों को अमानवीय तरीके से मौत के घाट उतारते हैं या संपत्ति को तबाह करते हैं, तब यह विषय किसी अकेले राष्ट्र के हितों का नहीं रह जाता, बल्कि वैश्विक आयाम ले लेता है. अत: सीरिया, इराक या लेबनान अथवा यमन और ट्यूनीशिया के खून-खराबे को मात्र पश्चिम एशिया के संकट या तेल की राजनीति के संदर्भ में देखना आत्मघातक ही साबित हो सकता है.
असलियत को अनदेखा करना अब नामुमकिन होता जा रहा है. दुनिया को दिखाने को अमेरिका बगदादी और उनके सामरिक ठिकानों पर लगातार हमले जारी रखे है, पर आइएसआइएस को खास नुकसान होता नहीं दिखता है. इस बात को नजरंदाज करना कठिन है, आखिर यह संगठन उस अलकायदा की ही नाजायज संतान है, जिसको पाकिस्तान की मदद से अमेरिका ने अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों को खदेड़ने के लिए जन्म दिया था. बाद में भले ही यह भस्मासुर उसी के लिए जानलेवा दुश्मन बन गया, इसके साथ अमेरिकी प्रशासन के रिश्ते दुश्मनी के साथ दोस्ती वाले रहे हैं.
कभी वह अच्छे और बुरे तालिबान में फर्क करता है, तो कभी तालिबान को पनाह देनेवाले पाकिस्तान के साथ संयम और सहानुभूति से पेश आने की राय भारत को देता है. सबसे विकट विडंबना यह है कि हमलावर बर्बर हिंसा से लबालब वहाबी इसलाम के सबसे बड़े समर्थक सऊदी अरब का सबसे बड़ा संरक्षक अमेरिका ही है. यह सोचना तर्कसंगत है कि तालिबानों और आइएसआइएस की साजिशों और हरकतों से वह पूरी तरह बेखबर कभी भी नहीं रहता.
मध्य पूर्व में अमेरिका के सामरिक हित सीरिया, इराक तक सीमित नहीं. इजरायल की संवेदनशीलता कम नहीं. लीबिया, मिस्र, सूडान, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और कुवैत कम अस्थिर नहीं. लेबनान, सोमालिया को भी इस सूची में शामिल किया जा सकता है. बात साफ है कि अमेरिका ने इसलामी आतंकवाद के बहाने जिन राज्यों को निशाने पर रख सिलसिलेवार तबाह किया है, वह लगभग सब के सब शीत युद्ध के युग में समाजवादी और रूस के पक्षधर रहे हैं.
हम जो देख रहे हैं, वह नये मुखौटे पहने पुराने शीतयुद्ध की फौजों की ही भिड़ंत है. हंटिंगटन जैसे विद्वान, जिसे सभ्यताओं की मुठभेड़ का नाम देते हैं, वह पूंजीवादी नव साम्राज्यवाद और इसके विरोधियों का संघर्ष है, जिसका निर्णायक युद्ध लड़ा जाना अभी बाकी है.
एक नजर रूस की तरफ डालें. पुतिन के लंबे राज में साम्यवादी पार्टी का ह्रास हुआ है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि रूस का कायाकल्प पूंजीवादी राज्य के रूप में हुआ है. यूक्रेन के संकट से यह स्पष्ट हो चुका है कि यूरोपीय समुदाय में उसकी सदस्यता का सवाल आज भी रूस को उत्तेजित करता है. उसकी इच्छा यह है कि वह रूस द्वारा स्थापित साझा बाजार में ही बना रहे. पुतिन के रहते इस बात की कोई संभावना नहीं कि पश्चिमी नमूने का जनतंत्र रूस में जड़ें जमा सकता है. यह बात रेखांकित करना जरूरी है कि इसलामी दहशतगर्दी से लहूलुहान होने के बावजूद रूस आइएसआइएस को लेकर खास परेशान नहीं लगता.
दूसरी तरफ सर्वनाशक कगार की तरफ सरकते सीरिया और इराक में गृहयुद्ध में ‘जनतांत्रिक’ सैनिक हस्तक्षेप करनेवाला अमेरिका रूस की घेराबंदी का मुकम्मल बंदोबस्त कर रहा है. अफगानिस्तान में सामरिक नाकामी की भरपाई वह इस तरह करता दिख रहा है. पुतिन ने क्रीमिया तथा यूक्रेन में जबर्दस्त पहल कर ओबामा को असमंजस में डाल दिया है. वह किसी धौंस-धमकी के आगे झुकने को तैयार नहीं है. अमेरिका आज यह सोचने को मजबूर हो रहा है कि बिना परमाणविक भयादोहन के वह कैसे पुतिन की गतिविधियों पर अंकुश लगा सकता है?
उसके लिए संतोष की बात इतनी भर है कि जब तक पाकिस्तान चीन के प्रभाव में है, तब तक कम से कम उस असफल राज्य में अमेरिकी सामरिक हित निरापद रहेंगे. ओसामा बिन लादेन के सफाये वाले अभियान को लेकर जो मनमुटाव पाकिस्तान के साथ हुआ, वह काफी हद तक दूर हो चुका है. जो नये रहस्योद्घाटन हुए हैं, उनसे यही बात प्रकट हुई है कि अलकायदा के साथ जो लड़ाई जोर-शोर से लड़ी जा रही है, वह हकीकत में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ सरीखी नूराकुश्ती है.
रूस की तरह चीन भी कट्टरपंथी इसलामी उगयुर तबके द्वारा सिंकियांग प्रांत के स्वशासित क्षेत्र में एकाधिक बार घायल हो चुका है, पर उसे भी आइएसआइएस की खास फिक्र नहीं. शी के चीन के लिए भी प्राथमिकता पुतिन के रूस की तरह संक्रामक इसलामी दहशतगर्दी की तुलना में अमेरिका की नाक की नकेल अपने हाथ में रखना है. वह पाकिस्तान और ईरान में ही नहीं, अरब जगत तथा अफ्रीका में भी अपनी खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के मद्देनजर किसी भी नस्लवादी, सांप्रदायिक या दहशतगर्द सरकार या गुट से परस्पर लाभप्रद समझौता कर सकता है.
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में फिर से भूराजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण बन रहे हैं. चीन जापान के कब्जे से सेनकाकू टापू समूह को छुड़ा कर हथियाने की कोशिश में लगा है और साथ ही दक्षिण चीनी सागर में अपना एकछत्र नौसैनिक प्रभुत्व स्थापित करने को तैयार है. वैसे ही जैसे पुतिन क्रीमिया प्रायद्वीप को रूस की सुरक्षा के लिए उतना ही महत्वपूर्ण समझते हैं, जितना स्तालिन और उनके सख्तजान उत्तराधिकारी.
कुल मिला कर इस घड़ी माहौल कमोबेश वैसा ही है, जैसा शीतयुद्ध के तनाव भरे बरसों में था. इकोनॉमिस्ट जैसी पत्रिकाएं यह अटकल लगाने लगी हैं कि क्या आज अमेरिका की पारंपरिक सैन्य शक्ति इस नयी रस्साकशी में उसके बैरियों का मुकाबला करने लायक है? हमें ठंडे दिमाग से यह बिचारने की जरूरत है कि हम आइएसआइएस और ईसाई अमेरिका और यूरोप की टक्कर के तमाशबीन ही न बने रहें. नये शीतयुद्ध की पदचाप सुनने के लिए अपने कान खुले रखें.

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