मर्यादा का प्रश्न

ललित मोदी प्रकरण में सच के सामने आने से देश का भला होगा. ऐसा करने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार के साथ कांग्रेस की भी है. अपशब्दों और अभद्रता की तू-तू मैं-मैं से झूठ और भ्रष्टाचार को ही फायदा मिलेगा. आजादी के बाद, करीब सात दशकों में हमारे देश की लोकतांत्रिक राजनीति ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे […]

ललित मोदी प्रकरण में सच के सामने आने से देश का भला होगा. ऐसा करने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार के साथ कांग्रेस की भी है. अपशब्दों और अभद्रता की तू-तू मैं-मैं से झूठ और भ्रष्टाचार को ही फायदा मिलेगा.
आजादी के बाद, करीब सात दशकों में हमारे देश की लोकतांत्रिक राजनीति ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं. तमाम खूबियों और खामियों के बावजूद हमारा देश मजबूत लोकतंत्र का एक उल्लेखनीय उदाहरण है. लेकिन अक्सर हमारे राजनेता अपने व्यवहार में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन और अतिक्र मण करते रहते हैं.
पिछले दिनों कांग्रेस के प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद राज बब्बर ने कुछ केंद्रीय मंत्रियों और एक मुख्यमंत्री पर आरोप लगाते हुए ऐसी ही अमर्यादित टिप्पणियां कीं, तो दूसरी तरफ भाजपानीत राजग के घटक दल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा सांसद अरुण कुमार ने राज्य के मुख्यमंत्री के विरु द्ध निंदनीय टिप्पणी की.
उन्होंने अपने बयान में जातिवादी उन्माद भड़काने की कोशिश के साथ मुख्यमंत्री के खिलाफ जघन्य हिंसा करने की बात भी कही. राज बब्बर द्वारा मंत्रियों के ‘महिला’ होने का संदर्भ देकर आलोचना करना न सिर्फ अशोभनीय है, बल्कि समानता और सम्मान के संवैधानिक-लोकतांत्रिक मूल्यों के विरु द्ध भी है. विपक्ष को सरकार को घेरने, उससे जवाब तलब करने तथा गलती करने पर इस्तीफा मांगने का पूरा अधिकार है.
प्रधानमंत्री द्वारा चार महिला मंत्रियों को नहीं हटाये जाने का राज बब्बर का बयान उनकी स्त्री-विरोधी मानिसकता के साथ उनमें राजनीतिक उत्तरदायित्व की भावना की कमी का भी संकेत करता है. विडंबना है कि राज बब्बर जिस पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता हैं उसकी प्रमुख महिला हैं तथा उस पार्टी ने देश की राजनीति में अनेक उल्लेखनीय महिला राजनेता दिये हैं. सिनेमा से राजनीति में आये इस नेता ने प्रधानमंत्री के लिए भी अपमानजनक संबोधन किये.
कांग्रेस और राज बब्बर को आज यह आत्ममंथन करने की जरूरत है कि क्या वे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के जीवन और व्यवहार से कुछ सीखना उचित नहीं समझते हैं और ऐसे महान नेताओं के नाम का उपयोग वे बस अपने राजनीतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिए करते रहते हैं. उन्हें अपने इतिहास से यह जानने की जरूरत है कि नेहरू अपने राजनीतिक विरोधियों का न सिर्फ सम्मान करते थे, बल्कि उनकी आलोचनाओं और सुझावों के प्रति भी सकारात्मक दृष्टिकोण रखते थे.
नेहरू जैसे नेताओं के ऐसे व्यवहारों से हमारी राजनीतिक परंपरा का मार्ग प्रशस्त हुआ है. ऐसे नेता कांग्रेस में ही नहीं, बल्कि दक्षिण, वाम और समाजवादी विचारधाराओं में भी थे. हमारे महान नेता एक-दूसरे की आलोचना में तार्किक रूप से बहुत तीक्ष्ण हुआ करते थे, पर उनकी भाषाई और व्यावहारिक शिष्टता अनुकरणीय है.
अगर ऐसा ही आचरण किसी पार्टी ने कांग्रेस नेतृत्व के लिए या पिछली सरकार के प्रधानमंत्री के विरुद्ध किया होता, तो क्या कांग्रेस उसका स्वागत करती? क्या कांग्रेस इतनी जल्दी भूल जायेगी कि यूपीए शासन के दौरान घपलों-घोटालों के रोज नये मामले सामने आते थे जिनमें उसके नेताओं और मंत्रियों की खुली मिलीभगत होती थी? अगर राज बब्बर के बयान की पृष्ठभूमि पर गौर करें, तो ललित मोदी प्रकरण में जो खबरें आ रही हैं, वे अभी प्रारंभिक आरोप हैं तथा किसी को निश्चित तौर पर दोषी या आरोपी ठहराने के आधार अपुष्ट हैं.
राज बब्बर, उनकी पार्टी या अन्य विपक्षी दलों को इन मामलों की समुचित जांच की मांग करने का अधिकार है. केंद्र सरकार का यह दायित्व है कि वह संदेह के कुहासे को साफ करे. लेकिन शक की सुई तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की ओर भी है.
उसका स्पष्टीकरण देने की जिम्मेवारी तो कांग्रेस को लेनी होगी. अगर कांग्रेस मौजूदा स्थिति में ईमानदारी और साफगोई दिखाये, तो वह केंद्र सरकार और भाजपा पर अधिक और कारगर दबाव बना सकेगी. ललित मोदी प्रकरण में सच के सामने आने से देश का भला होगा. ऐसा करने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार के साथ कांग्रेस पार्टी की भी है. अपशब्दों और अभद्रता की तू-तू मैं-मैं से झूठ और भ्रष्टाचार को ही फायदा मिलेगा.
रालोसपा नेता अरु ण कुमार जिस प्रकरण में मुख्यमंत्री पर हिंसक हमला करने की धमकी दे रहे हैं, वह एक न्यायिक और प्रशासनिक मसला है तथा उसमें आखिरी फैसला अदालत को करना है. ऐसे मामले को जातिवादी उन्माद का रंग देकर और मुख्यमंत्री के खिलाफ अनाप-शनाप बयान देकर राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों की अवमानना है. ये हालिया प्रकरण राजनीति के गिरते स्तर की मिसाल हैं और बडे अफसोस की बात है कि ऐसी बदजुबानियों की फेहरिश्त लंबी होती जा रही है.
दुर्भाग्यवश राजनीतिक अभद्रता करनेवाले ऐसे नेता विभिन्न राजनीतिक दलों में हैं जिनकी अभिव्यक्तियों की असंवेदनशीलता मर्यादा और सभ्यता की हर सीमा का उल्लंघन करती है. अब समय आ गया है कि इस वैचारिक पतन पर हमारे नेता और राजनीतिक दल गंभीर आत्मचिंतन करें.

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