तो क्या भोजन भी हो जायेगा विलुप्त?

हमारा भारत कृषि प्रधान देश है. हम कृषि का विकास करना चाहते थे, लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी आज तक न तो इसका विकास हुआ है और न ही कृषि क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है. जंगल साफ हो चुका है. पहाड़ों का का अस्तित्व भी मिटता जा रहा है. अब पौधा लगाना, तालाब […]

हमारा भारत कृषि प्रधान देश है. हम कृषि का विकास करना चाहते थे, लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी आज तक न तो इसका विकास हुआ है और न ही कृषि क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है. जंगल साफ हो चुका है. पहाड़ों का का अस्तित्व भी मिटता जा रहा है. अब पौधा लगाना, तालाब खोदना, मछली पालन करना मानो सपना हो गया है.
देश में पेयजल की उपलब्धता और वर्षा पानी का संचयन करने के लिए जिन तालाबों की खुदाई की गयी थी, वे या तो विलुप्त हो गये या फिर उनकी स्थिति दयनीय है. कई तालाबों का अस्तित्व खतरे में है. सरकार ने घर-घर में शौचालय का नारा दिया है, लेकिन इन शौचालयों से निकलनेवाले अवजल के शोधन की व्यवस्था नहीं है.
ये अवजल या तो नदियों में बहाये जा रहे हैं या फिर पुराने तालाबों को गंदा कर रहे हैं. आज स्थिति यह है कि सागर, पहाड़, नदियां, जंगल आदि प्रदूषित हो रहे हैं. हमने अपने हाथों से ही इन प्राकृतिक संसाधनों को तहस-नहस कर दिया है. यहां तक कि मानवों के कुकृत्यों से जीव-जंतुओं का भी विनाश हो रहा है. कई प्रजाति के जीव विलुप्त हो गये हैं या होने के कगार पर हैं.
यहां तक कि जंगल का राजा कहा जानेवाला बाघ भी आज किताबों में ही सज कर रह गया है. वनों की कटाई होने से मॉनसून के आगमन में भी देर हो रही है. कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि और समुद्री तूफान से विनाश हो रहा है. कहां हमने कृषि के विकास का सपना देखा था, लेकिन आज हमारी करतूतों से ही प्रकृति का क्षरण हो रहा है.
आज कोई भी आदमी खेती करना नहीं चाहता. सभी शहर की ओर पलायन कर रहे हैं. नौकरी पेशे का उत्तम साधन बन गया है. पहले खेती उत्तम साधन थी. कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में भोजन भी विलुप्त हो जाये.
देवकुमार सिंह, आमला टोला, चाईंबासा

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >