‘दो दशक में 1385 महिलाओं की हो चुकी है हत्या.’ प्रभात खबर में 14 जून को प्रकाशित यह खबर महिला सशक्तीकरण के मुख पर जोरदार तमाचा है. दुख तो तब और होता है, जब डायन-बिसाही के नाम पर लाचार और गरीब स्त्रियों की हत्या की जाती है.
बीते दो दशकों के बीच गरीब स्त्रियों की हत्या का यह आंकड़ा झारखंड सरकार का है. सवाल यह पैदा होता है कि क्या बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हू, तिलका मांझी, मानकी-सिंगी ढई आदि ने ऐसे ही राज्य के लिए अपने जीवन को होम कर दिया था?
पत्थरों से बने मंदिर-मसजिदों के ढहाने या किसी देवी-देवता की प्रतिमा तोड़े जाने पर हमारे देश में भूचाल आ जाता है, लेकिन साक्षात देवियों की हत्या पर सन्नाटा क्यों छाया हुआ है? ‘राज्य के गांवों में बरकार है ऐसा अंधविश्वास.’ मैं इस कथन से सहमत नहीं हूं. यह अंधविश्वास नहीं, सामाजिक साजिश और षड़यंत्र है. बेबस स्त्रियों का उपहास है.
उनकी लाचारी पर दबंगों का अट्टहास है. यह सर्वविदित है कि डायन-बिसाही के आरोप में अंधविश्वास की आड़ में उनकी थोड़ी सीर संपत्ति, जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा हड़पने की सोची-समझी चाल है. ऐसी हत्याओं में स्त्रियों को एक लंबी यातना और हृदयविदारक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. जबरदस्त पिटाई करके उनसे कहलवाया जाता है कि वह डायन है.
जान बचाने के लिए लाचार और बेबस स्त्रियां खुद को डायन बताती हैं. फिर भी समाज के दबंग उनकी जान बख्शते नहीं हैं. कारण कि उनकी नजर उसकी संपत्ति पर टिकी होती है. इसके परिप्रेक्ष्य में झारखंड के मुख्यमंत्री जी से आग्रह है कि हमारे देश के डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम में संशोधन करवाया जाये. दंड के नाम पर सिर्फ खानापूरी न हो.
डॉ उषा किरण, रांची
