मंगल यान की सफलता ने भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के उत्कर्ष काल की स्मृति को जगा दिया है. यह समय मोदी मुहूर्त में आया, क्या यह केवल संयोग कहा जायेगा या इसे भारत के नवोदय की पदचाप के रूप में देखा जाना चाहिए?
मंगल मिशन की असाधारण सफलता ने विश्व के विज्ञान जगत में ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामरिक क्षेत्र में भी भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है और एक धमक पैदा की है. यह सामान्य बात नहीं है कि वर्तमान परिदृश्य में भारत दुनिया का पहला देश बन गया है, जिसने अपने पहले प्रयास में ही अपने अंतरिक्ष यान को मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित कर दिया. भारत का अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह की सतह से 515 किमी दूर और पृथ्वी की सतह से करोड़ों किमी दूर पहुंचाया गया. इसका पूरा संचालन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों ने किया है. 24 सितंबर, 2014 को इस अंतरिक्ष यान को सुबह 6:57 बजे पर मंगल की दिशा में मोड़ा गया और उसके मुख्य इंजन को 7:17 बजे सुबह दागा गया, ताकि अंतरिक्ष यान तीव्र गति के प्रभाव से मंगल की कक्षा में प्रवेश कर सके. 5 नवंबर, 2013 को श्रीहरि कोटा से छोड़े गये इस मंगलयान की सफलता के बाद भारत अमेरिकी, रूसी और यूरोपीय संघ की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसियों के बाद चौथा ऐसा देश बन गया है, जिसने मंगल ग्रह पर शोध एवं अनुसंधान के लिए अपना अंतरिक्ष यान सफलतापूर्वक भेजा है.
जिस विराट सफलता ने पूरे विश्व में भारत का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित किया है, उसकी पूरी लागत सिर्फ 450 करोड़ रुपये आयी है. दुनिया का कोई देश इतनी कम लागत में यह कामयाबी हासिल नहीं कर सका है. कुल 300 दिन की इस लंबी यात्रा के बाद हमारा अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह की कक्षा में कुशलता पूर्वक स्थापित हुआ, तो दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने इसरो के अध्यक्ष के राधाकृष्णन और सहयोगी वैज्ञानिकों को बधाई दी. इस कार्य में अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) तथा स्पेन के मेड्रेड और ऑस्ट्रेलिया के केनेबरा स्थित अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थानों ने भी इसरो के गहन अंतरिक्ष नेटवर्क केंद्र से नियंत्रण संपर्क बनाये रखा था. यह केंद्र बेंगलुरु से 40 किलोमीटर दूर बैलालू में है. हालांकि भारत में मीडिया और लेखकों का एक वर्ग ऐसा भी है, जिसे मंगलयान की सफलता के समय भारत के वैज्ञानिकों की इस बेमिसाल कामयाबी की चर्चा से ज्यादा जरूरी अमेरिका और ओबामा के मुद्दे प्रतीत होते हैं.
मंगल मिशन का मुख्य उद्देश्य विभिन्न ग्रहों पर भेजे जानेवाले भारतीय अंतरिक्ष यानों के डिजाइन, योजना, प्रबंधन तथा उसके प्रक्षेपण, आरोहण एवं अवतरण तक की स्वदेशी वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी में कुशलता प्राप्त करना है. मंगल यान के प्रक्षेपण का उद्देश्य भी यही था कि भारतीय प्रतिभा और प्रौद्योगिकी के सहारे अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण हो, पृथ्वी से उसके प्रबंधन, 300 दिन की अंतरिक्ष यात्र में दिन-प्रतिदिन और पल-प्रतिपल की निगरानी तथा अंतत: मंगल की कक्षा में प्रवेश करवा कर ग्रह के चारों ओर की परिक्रमा का मापन. अत्यंत गहरे अंतरिक्ष में पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर यान भेजने के बाद उसकी प्रत्येक गतिविधि पर नजर रखने के साथ-साथ उसकी दिशा और उसकी काया को नियंत्रित और निर्देशित करने का कमाल कर दिखाया है भारत के वैज्ञानिकों ने.
कुछ लोग ऐसे भी होंगे कि कहेंगे इतने महंगे अंतरिक्ष यान को छोड़े जाने की आवश्यकता क्या थी? इसका उत्तर एक ही हो सकता है कि ज्ञान और विज्ञान के बिना मनुष्य केवल पशुवत जीवन जीनेवाला प्राणी कहा जा सकता है. अपनी बुद्धि, विवेक और प्रज्ञा का उपयोग कर पृथ्वी पर जीवन को बेहतर बनाना और इस ग्रह एवं ब्रrांड के हजारों ग्रहों के रहस्यों को जानना ही मनुष्य के जीवन की उच्चस्तरीय अभिव्यक्तियां हैं. यदि ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में हमारा योगदान नहीं होगा, तो जीवन का उद्देश्य राजनीति और नौकरी से पूरा नहीं किया जा सकता. समाज की उन्नति और समृद्धि के लिए चक्र, अग्नि, पिंट्रिंग प्रेस, रेल इंजन, मशीन, बिजली एवं कंप्यूटर ने जैसे योगदान दिया, उसी तरह अंतरिक्ष शोध और अनुसंधान ने हमारे भविष्य की रूपरेखा बदल दी है. चंद्रमा, सूर्य, शनि, वृहस्पति जैसे ग्रहों पर आज भी रहस्य की असंख्य परतें चढ़ी हुई हैं.
भारत के प्राचीन वैज्ञानिकों ने इन तमाम ग्रहों और ब्रह्नांड के अनेक रहस्यों का पता लगाने का प्रयास किया था. एक हजार वर्ष से भी पहले इन वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया था कि सूर्य एक नहीं अनेक हैं. लाखों किलोमीटर दूर स्थित इन ग्रहों का अपनी सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन कर इन ऋषि वैज्ञानिकों ने न केवल इन ग्रहों के नाम रखे, बल्कि उनकी प्रकृति और गुणों का भी सही वर्णन किया. इसलिए मंगल को लाल रंग से जोड़ा गया, जो हजारों वर्ष बाद अमेरिकी अंतरिक्ष शोध संस्थान नासा ने अपने वर्षो के शोध और अरबों डॉलर खर्च करने के बाद सही पाया. यह वैज्ञानिक सत्य है, जिसे भारत का साधारण किसान और गृहिणी भी जानती है कि मंगल का अर्थ लाल होता है, उसकी प्रकृति और स्वरूप लाल है. दुर्भाग्य से लगातार बर्बर विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों में भारत की वह ज्ञान-विज्ञान की संपदा न केवल नष्ट हुई, बल्कि प्राचीन पद्धति से शोध और अनुसंधान की परंपरा भी खंडित हो गयी. भारत में जो भी है, वह पिछड़े हुए समाज का प्रतीक है. यह भावना मुगलों और अंगरेजों के बाद प्रचलित हुई तथा यह माना जाने लगा कि ज्ञान-विज्ञान और सभ्यता के उत्कर्ष क्षेत्र केवल पश्चिम है.
हमें यह भी विस्मृति भी करायी गयी कि ऑक्सफोर्ड और हॉर्वर्ड जैसे संस्थानों की स्थापना से दो हजार साल पहले विश्व के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान और विज्ञान के केंद्र नालंदा तथा तक्षशिला विश्वविद्यालयों के रूप में भारत में स्थापित थे. जब तक्षशिला में इसलामी हमलावरों ने विश्वविद्यालय ध्वंस किया, तो वहां तीस लाख हस्तलिखित पुस्तकें थीं. जो समाज दो हजार वर्ष पहले तीस लाख हस्तलिखित पुस्तकें रच सकता होगा, उसे ज्ञान और विज्ञान के उस पुस्तक तक पहुंचने के लिए कितने हजार वर्षो की यात्र तय करनी पड़ी होगी? इसका अंदाजा लगाने की भी आज किसे फुरसत है? मंगल यान की सफलता ने भारत के उसी प्राचीन ज्ञान तथा विज्ञान के उत्कर्ष काल की स्मृति को जगा दिया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए एक ऐसे नये सवेरे को अपनी प्रार्थना का अघ्र्य चढ़ाया, जो शताब्दियों के बाद भारत के क्षितिज पर उग रहा है. यह समय मोदी मुहूर्त में आया, क्या यह केवल संयोग कहा जायेगा या इसे भारत के नवोदय की पदचाप के रूप में देखा जाना चाहिए?
तरुण विजय
राज्यसभा सांसद, भाजपा
tarunvijay2@yahoo.com
