टमाटर बेचने में जो ''टशन'' है!

अंशुमाली रस्तोगी व्यंग्यकार anshurstg@gmail.com मेरे एक मित्र का टमाटर का बड़ा करोबार है. उसके बाप-दादा भी यही काम किया करते थे. अब बेटा उनके कारोबार को आगे बढ़ा रहा है. टमाटर बेचकर उसने अपनी शानदार कोठी खड़ी कर ली है. एक महंगी कार ले ली है. बच्चे भी शहर के ऊंचे स्कूलों में पढ़ रहे […]

अंशुमाली रस्तोगी

व्यंग्यकार

anshurstg@gmail.com

मेरे एक मित्र का टमाटर का बड़ा करोबार है. उसके बाप-दादा भी यही काम किया करते थे. अब बेटा उनके कारोबार को आगे बढ़ा रहा है. टमाटर बेचकर उसने अपनी शानदार कोठी खड़ी कर ली है. एक महंगी कार ले ली है. बच्चे भी शहर के ऊंचे स्कूलों में पढ़ रहे हैं. कुल मिलाकर मित्र की लाइफ टनाटन चल रही है.

हालांकि, मित्र ने मुझसे भी कई दफा अपने कारोबार में आ जाने का निमंत्रण दिया, लेकिन मैंने हमेशा यह कहकर टाल दिया कि मैं टमाटर नहीं बेचूंगा. व्यंग्यकार हूं और उम्रभर व्यंग्य ही लिखूंगा.

मित्र को मेरा व्यंग्यकार होना पसंद नहीं आता. वह छूटते ही ताना मारता है- व्यंग्य लिखकर जितना कमाते हो न, इससे ज्यादा की तो मैं टमाटर बेच देता हूं मिनटभर में.

इधर जब से टमाटर के दाम ने आसमान छुआ है, तो मित्र के धंधे में और भी निखार आ गया है. सुना है, अब तो वह ऑनलाइन भी टमाटर बेचने लगा है.

अभी तक मंदी और चालान का भय ही जनता को सता रहा था, अब टमाटर की बढ़ी कीमतें उसे रुला रही हैं. लेकिन, मेरा मित्र खुश है. वह चांदी काट रहा है.

जिन्हें हर हाल में टमाटर खाना ही खाना है, वे इसे हर कीमत पर खरीदने को तैयार हैं. किंतु मुझ जैसा मध्यमवर्गीय आदमी इतनी महंगी टमाटर नहीं खरीद सकता. इसलिए मैं टमाटर को लेकर बस मन मसोस कर रह जाता हूं.

मेरी बीवी को एक दिन टमाटर न मिले, तो वह पहाड़ सिर पर उठा लेती है. कितने ही प्रकार के ताने मुझे मार देती है. मेरे व्यंग्यकार होने पर जाने क्या-क्या बोल देती है. मेरे टमाटर बेचनेवाले उस मित्र से मेरी ऊल-जलूल बराबरी करने लगती है. यानी- मेरी बेइज्जती का कोई अवसर वह हाथ से जाने नहीं देती है.

अब तो आदत-सी पड़ गयी है ये सब सुनने की. सुनने के अतिरिक्त कुछ और मैं कर भी तो नहीं सकता. आखिर बीवी है मेरी. कुछ अंट-संट बोल दिया, तो लेने के देने पड़ जाने हैं. इसीलिए चुप रहने में ही खुद की भलाई समझता हूं.

लेकिन कभी-कभी मुझे मित्र और बीवी के ताने सही भी लगते हैं. अगर आज मैं व्यंग्य न लिख रहा होता, तो निश्चित रूप से टमाटर ही बेच रहा होता. मेरा भी मेरे मित्र जैसा बड़ा करोबार होता. मेरे कने भी कोठी-गाड़ी होती.

व्यंग्यकार बनकर हासिल ही क्या किया मैंने! इतना छपने के बावजूद अभी मुझे वह पहचान नहीं मिल पायी है, जिसकी दरकार हर-एक लेखक को रहती है.

हमारी दुनिया में एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि आप सिर्फ लिखकर ही आरामतलब जिंदगी नहीं जी सकते.

टमाटर बेचने में जो ‘टशन’ है, वह व्यंग्य लिखने में नहीं. सोच रहा हूं अगर अपने लाइफ-स्टाइल को बेहतर बनाना है, तो मुझे अपने मित्र की बात मान लेनी चाहिए. व्यंग्य की लाइन छोड़कर टमाटर का दामन थाम लेना चाहिए.

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