संविधान के अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक पुनर्गठन से संबंधित प्रस्तावों के बारे में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यह भारत का आंतरिक मामला है. खबरों के मुताबिक, इस संबंध में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों समेत अनेक देशों को भारत ने यह संदेश दे दिया है.
दुनिया भी इस मसले से पूरी तरह वाकिफ है. यही कारण है कि सिर्फ पाकिस्तान ने ही भारत की पहल का विरोध किया है. उसका यह रुख स्वाभाविक भी है, क्योंकि इस निर्णय से कश्मीर घाटी में अलगाववाद और आतंकवाद को संरक्षण देकर भारत को अस्थिर करने की दशकों पुरानी पाकिस्तानी नीति को गहरा झटका लगा है.
उसने कश्मीर के मसले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की भी लगातार कोशिश की है. कुछ दिन पहले ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से इसमें मध्यस्थता करने की गुहार भी लगायी थी. अब वे विभिन्न देशों से भारत की शिकायत में लगे हुए हैं. हालांकि पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाकर चर्चा करने का नाटक तो हुआ है, पर सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि बैठक के मूल एजेंडे में न तो भारतीय पहल का उल्लेख हुआ और न ही शुरू में उसमें इमरान खान शामिल हुए.
एक तो पाकिस्तान खुद ही जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर अवैध रूप से काबिज है, जिसमें से कुछ इलाकों को 1970 में ही काट कर अलग कर दिया गया है. गिलगिट-बाल्टिस्तान के इस भाग और शेष पाक-अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन कर रहा है. इन क्षेत्रों में सेना और प्रशासन के अधिकारियों को जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े बांटने का सिलसिला भी जारी है.
पाकिस्तान ने चीन के आर्थिक गलियारे के लिए भी इन इलाकों में जगह का आवंटन किया है. इस शोषण को बरकरार रखने के लिए वहां के बाशिंदों का दमन भी होता है. ऐसे में कश्मीर के लोगों के लिए उसका चिंतित होना एक ढोंग है. बलूच, पख्तून और मुहाजिर समुदायों के साथ पाकिस्तान का सौतेला व्यवहार जगजाहिर है.
इन तबकों के बुनियादी अधिकारों को दशकों से कुचला जा रहा है और उनके नेताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है. कश्मीर पर पाक-प्रपंच से परिचित होने के कारण ही उसके करीबी चीन और इस्लामिक देशों के संगठन ने अनुच्छेद 370 को लेकर कुछ नहीं कहा है. आतंकी और चरमपंथी ताकतों को पनाह देकर भारत और अफगानिस्तान समेत दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैदा करने के कारण काफी समय से अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान की आलोचना करता रहा है.
खुद इमरान खान यह मान चुके हैं कि उनके यहां 30-40 हजार आतंकी हैं और इस बारे में पहले पाकिस्तान दुनिया को गुमराह करता रहा है. बहरहाल, अब पाकिस्तान को अपनी हरकतों से बाज आना चाहिए. घाटी के अलगाववादी और हिंसक तत्वों को उकसाने और नियंत्रण रेखा व अंतरराष्ट्रीय सीमा पर युद्धविराम का उल्लंघन करने से भी बाज आना चाहिए.
