कर्नाटक में पिछले एक महीने से चल रहा सियासी संकट आखिरकार खत्म हो गया. येदियुरप्पा सरकार को बहुमत मिल गया है, लेकिन दिलचस्प बात है कि यह बहुमत ध्वनिमत से प्राप्त हुआ. इस दौरान विपक्ष ने मत विभाजन की मांग नहीं की. संभव है कि विपक्षी गठबंधन को मत विभाजन की स्थिति में अपने विधायकों द्वारा पाला बदलने की आशंका रही होगी.
दरअसल, राज्य में सियासी शह और मात के चलने वाले लंबे खेल के बाद राजनीतिक निष्ठा और विश्वास अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच चुका है. जो भी हो, कर्नाटक के राजनीतिक बवंडर ने विधायकों की राजनीतिक-वैचारिक निष्ठा, सदन में स्पीकर की भूमिका, न्यायालय के क्षेत्राधिकार, दल-बदल विरोधी कानून के उचित उपयोग आदि पर कुछ गंभीर प्रश्न जरूर खड़े कर दिये हैं.
चंदन कुमार, देवघर
