आम का वह खास फिरंगी दीवाना

niralabidesia@gmail.com आम भारत का फल है, दुनिया को भारत की देन है. रामायण, महाभारत से लेकर बुद्ध के काल तक आम की चर्चा है. लोग आम के बारे में ह्वेनसांग, इब्न-ए-बतूता के लिखे का भी हवाला देकर बताते हैं. खुसरो से लेकर बाद में भारत के शायरों, कवियों, लेखकों ने आम पर क्या, किस-किस रूप […]

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आम भारत का फल है, दुनिया को भारत की देन है. रामायण, महाभारत से लेकर बुद्ध के काल तक आम की चर्चा है. लोग आम के बारे में ह्वेनसांग, इब्न-ए-बतूता के लिखे का भी हवाला देकर बताते हैं. खुसरो से लेकर बाद में भारत के शायरों, कवियों, लेखकों ने आम पर क्या, किस-किस रूप में लिखा, यह बात भी चलती रहती है.
लेकिन, आम पर जिस आदमी का काम था, उसे हम याद नहीं करते. वह एक असाधारण फिरंगी थे, जो यूरोप से निकलकर पौधों की तलाश में पूरी दुनिया घूमे, 500 से अधिक वनस्पतियों की खोज की और फिर आखिर में भारत आकर आम की दुनिया में रम गये और भारत को, बिहार को उन्होंने जो दिया, वह आज भी उसकी निशानी मौजूद है.
वह फिरंगी विद्वान जर्मन वनस्पतिशास्त्री चार्ल्स मैरिस थे. मैरिस वनस्पतिशास्त्र के क्षेत्र में अपने काम की वजह से लिनन सोसायटी के फेलो बने, जिन्हें विक्टोरिया मेडल आॅफ आॅनर भी मिला था. जो ब्रिटेन की महारानी के गार्डन के प्रमुख बन गये थे.
मूल रूप से यार्कशायर में एक मोची पिता के संतान के रूप में जन्में चार्ल्स मैरिस के दुनिया के मशहूर वनस्पतिशास्त्री बनने का प्रसंग बहुत रोचक है.
दुनिया के कई देशों में घूमने के बाद मैरिस 1882 में भारत पहुंचे और 1898 तक दरभंगा में रहे. यानी उस समय के दरभंगा नरेश महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की मृत्यु तक. महाराजा की मृत्यु के बाद मैरिस ग्वालियर चले गये. वहां राजा के यहां चीफ गार्डन सुपरिटेंडेंट बन गये. दरभंगा में रहते हुए मैरिस ने महाराजा के साथ मिलकर आनंदबाग की योजना बनायी, जिसमें चंदन, रूद्राक्ष जैसे सैकड़ों पेड़ लगे. लेकिन, मैरिस का मुख्य काम आम की वेरायटी को विकसित करना रहा. मैरिस ने महाराजा के नाम पर लक्ष्मेश्वर भोग विकसित किया- शाह पसंद, सुंदर पसंद, दुर्गा भोज जैसी करीब 40 अलग-अलग खास वेरायटियां.
मैरिस ने भारत में आम की दुनिया पर एक किताब तैयार की थी- कल्टिवेटेड मैंगोज आॅफ इंडिया. वह किताब छप न सकी. इस किताब में मैरिस ने भारत के सौ से अधिक आमों के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी. सुंदर रेखाचित्रों के साथ. जानकार बताते हैं कि वह किताब अब भी लंदन के रॉयल बोटानिकल गार्डन के आर्काइव में सुरक्षित है.
मैरिस को दरभंगावाले अब भी याद करते हैं. दरभंगा का तो यूं भी आम से बहुत पुराना और खास लगाव रहा है. आईने अकबरी में भी दरभंगा के आम बगीचे की चर्चा है. उसमें दर्ज है कि मुगल बादशाह अकबर ने दरभंगा में आम के एक लाख पेड़ लगवाये थे, जिसे लखिया बाग कहा जाता था.
वह लखिया बाग अब दरभंगा में साधु बाग हो गया है. आम के पौधे अब वहां नहीं मिलते. चार्ल्स मैरिस के दरभंगा से गये भले करीब सवा सौ साल हो गये हों, लेकिन दरभंगा और आस-पास के इलाके में पीढ़ियों से आम से लगाव-जुड़ाव, मोह-मोहब्बत ऐसा है कि आम लोकमानस में आम के पुराने किस्से और मैरिस जैसे नायक जीवंतता के साथ मौजूद हैं.

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