आयी चिट्ठियों की याद

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com चिट्ठियों के लिए घर के नीचे लगा लेटर बाॅक्स अब खाली रहता है. एक दशक पहले तक रोज इसमें इतनी चिट्ठियां होती थीं कि नीचे भी गिर पड़ती थीं. दूर से डाकिये को देखकर अनुमान लगाया जाता था कि किसकी चिट्ठी आयी होगी. मां-पिता की, भाई-बहन की, चाची-ताई या मौसी […]

क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

kshamasharma1@gmail.com

चिट्ठियों के लिए घर के नीचे लगा लेटर बाॅक्स अब खाली रहता है. एक दशक पहले तक रोज इसमें इतनी चिट्ठियां होती थीं कि नीचे भी गिर पड़ती थीं. दूर से डाकिये को देखकर अनुमान लगाया जाता था कि किसकी चिट्ठी आयी होगी. मां-पिता की, भाई-बहन की, चाची-ताई या मौसी की. चिट्ठियां एक तरह से संयुक्त परिवार के संबंधों के निर्वाह, एक-दूसरे का हाल-चाल, उत्सव, दुख आदि साथ लाती थीं. वे न केवल हाल-चाल देती थीं, संवाद का बेहतरीन साधन भी थीं.

और प्रेम पत्रों का तो कहना ही क्या. लेकिन अकसर प्रेम पत्र डाक से नहीं भेजे जाते थे, क्योंकि घर वालों के हाथ पड़ने और पिटाई का खतरा रहता था. और लड़की के लिए लिखे गये प्रेम पत्र यदि किसी और को मिल जायें, तो तरह-तरह से ब्लैकमेलिंग का खतरा भी रहता था. कई बार बदला निकालने के लिए लड़कियों के स्कूल-काॅलेज में पोस्टकार्ड पर लिखकर पत्र भेजे जाते थे. बहुत से स्कूलों में प्रार्थना के वक्त इन्हें सरेआम पढ़ा जाता था. इस कारण लड़कियों को बहुत अपमान झेलना पड़ता था, जबकि गुमनाम लेखक या लड़के बच जाते थे.

लेकिन तकनीक ने प्रेमियों की दुनिया से प्रेम पत्रों को भी विदा कर दिया है. अब तो इधर मैसेज लिखा, मेल किया, व्हाॅटसएप किया, उधर जवाब आया. प्रेम पत्रों का इंतजार या प्रिय के संदेशों के न मिलने से जो दुख या विरह उपजता था, वह गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं.

इसीलिए साहित्य में भी अब वियोग या विप्रलंभ की कविताएं, कहानियां नहीं लिखी जातीं. आज की पीढ़ी को तो शायद वियोग का अर्थ ही नहीं पता. जबकि कुछ दशक पहले हर पत्र संभालकर रखे जाते थे. और समय-समय पर उन्हें पढ़ा जाता था. वे लोग जो एक-दूसरे से हमेशा के लिए जुदा हो गये, उनकी यादों का सहारा ये पत्र ही होते थे. दुनियाभर के पुस्तकालय में महान लोगों के लिखे पत्र बहुतायत में मौजूद हैं.

तकनीक ने दूरियां कम की हैं. पूरा विश्व आज एक क्लिक के इशारे पर है. इसी अनुपात में प्रेम की कोमल भावनाएं भी कम हो गयी हैं. दूरी से एक-दूसरे के लिए जो चाहत जगती थी, भावनाओं का ज्वार उमड़ता था, इसका अनुमान भी आज की पीढ़ी नहीं लगा सकती. ‘लिखे जो खत तुम्हें’ या गुलाम अली की गायी मधुर गजल- ‘तुम्हारे खत में नया इक सलाम किसका था’ या ‘चिट्ठी आयी है’ जैसी रचनाएं अब सुनायी नहीं देतीं.

प्रेम पत्र तो क्या, लोग लिखना ही भूल गये हैं. हो सकता है कि एक जमाना ऐसा आये, जब युवा यह जानकर हैरान रह जायें कि कभी हाथ से भी लिखा जाता था.

अब तो लेखन कला के प्रदर्शन सिर्फ किसी परीक्षा के वक्त होते हैं. जैसे-जैसे कंप्यूटर हमारे जीवन में जगह बनाता जा रहा है, लिखने की कला ही खत्म होती जा रही है. ऐसे में प्रेम पत्र या सामान्य घरेलू पत्रों का इंतजार भी खत्म हो गया है. उन्हें भुला दिया गया है.

शायद इसीलिए अब पत्र लेखन कला को जीवित रखने के लिए तरह-तरह के प्रयास किये जा रहे हैं. इटली में बाकायदा प्रेम पत्र लिखना सिखाने का इंस्टीट्यूट खोला गया है.

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