झारखंड संयुक्त प्रवेश प्रतियोगिता परीक्षा पर्षद (जेसीइसीइबी) द्वारा शांतिपूर्ण व विवाद रहित परीक्षा संचालन चर्चा का विषय था. 10-11 दिनों में जेसीइसीइबी द्वारा परीक्षाफल का प्रकाशन तो विशेषकर चर्चा का विषय बना. इतने कम दिनों में देश के किसी भी बोर्ड या काउंसिल ने अपना परीक्षाफल कभी नहीं निकाला था.
इसके पहले समयसीमा के अंतर्गत इंटर साइंस व कॉमर्स के परीक्षाफल का प्रकाशन मंत्रलय के लिए गौरव का विषय था. लेकिन मंगलवार को नामकुम स्थित झारखंड संयुक्त प्रवेश प्रतियोगिता परीक्षा पर्षद (जेसीइसीइबी) में काउंसेलिंग को लेकर जो भी हुआ, वह प्रकट रूप से पर्षद की उपरोक्त चर्चा से मेल नहीं खाता है. काउंसेलिंग में जिस तरह चीजें घटित हुईं, प्रथम दृष्टया वह पर्षद की कार्यशैली तथा उसके प्रबंधन का ही नतीजा है. मैट्रिक या इंटर के रिजल्ट के पीछे तो पर्षद के हिडेन एजेंडा की चर्चा पहले भी यह अखबार कर चुका है. आइआइटी में उत्तीर्ण छात्र का जैक द्वारा आयोजित इंटर की परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना भी जैक की पोल खोल जाता है.
मंगलवार को जो भी हुआ वह पर्षद ही नहीं, राज्य और राज्य की प्रतिभा के भविष्य के लिए भी अमंगल से भरा है. जेसीइसीइबी ने इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण छात्रों के लिए एक जुलाई से काउंसेलिंग की तिथि तय रखी थी. नौ बजे पूर्वाह्न से एक दिन में 400-400 के समूह में तीन बार बारह सौ छात्रों की काउंसेलिंग नौ जुलाई तक होनी थी. एक दिन पहले सोमवार की रात, मंगलवार की सुबह से आये छात्रों-अभिभावकों की जिज्ञासा शांत करनेवालों का बारह बजे तक कोई पता नहीं था. एक-डेढ़ बजे दोपहर से काउंसेलिंग प्रक्रिया शुरू हुई और तीन बजे तक लगभग दो सौ छात्र ही प्रक्रिया में शामिल हो पाये थे.
बिजली कटने पर जेनेरेटर की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं थी. लिंक फेल को वजह बताया जा रहा था. बाजारवाद के इस घोर स्पर्धा भरे दौर में जहां धर्म-अध्यात्म से लेकर राजनीति तक का सभी आयोजन इवेंट की तरह बरता जाने लगा हो, ऐसे में किसी क्षेत्र के लिए इससे किनाराकशी निश्चय ही उसके प्रदर्शन को डरावने परिणाम से भर देगी. मंगलवार को भी ऐसा ही कुछ हुआ. अधीर अभिभावकों द्वारा तोड़फोड़ किया जाना यही जताता है. अभिभावकों के कृत्य तो निंदनीय हैं ही, पर छात्रों को अनिश्चय के भरोसे छोड़ देना कहीं से भी क्षम्य नहीं.
