बिहार की राजधानी पटना में पुलिस की वरदी लगातार दागदार हो रही है. एक पखवाड़े के भीतर ही तीन घटनाएं हुई हैं. पहले मामले में करीब 12 साल पहले एक फरजी मुठभेड़ मामले में पुलिस अफसर को फांसी की सजा सुनाई गयी. लेकिन इस मामले से पुलिस अधिकारियों ने शायद ही सीख ली.
अगर, सीख ली होती तो बिहटा का मामला नहीं हुआ होता, जिसमें एक थानेदार पर एक युवक को सरेआम गोली मारने का आरोप लग रहा है. युवक अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रहा है. तीसरा मामला ऑनर कीलिंग का है. इसमें आरोपी एक सिपाही है. बिहार में एक बार फिर आपराधिक घटनाओं में तेजी आयी है. लेकिन दुखद है कि वरदीधारी भी आपराधिक घटनाओं में शामिल हैं. इससे जनता का न केवल मनोबल टूटता है, बल्कि पुलिस की छवि भी धूमिल होती है.
पुलिस में जो नैतिक साहस होना चाहिए, उसके अभाव का असर समाज पर व्यापक तौर पर पड़ता है. बिहार और झारखंड ही देश के एक मात्र ऐसे राज्य हैं, जहां पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के अलग-अलग संगठन हैं. इन संगठनों को जिस उद्देश्य से गठित किया गया था, उससे इतर ये काम कर रहे हैं. पुलिस अधिकारियों का संगठन हो, या पुलिसकर्मियों का, दोनों कल्याण के नाम पर दोषी पुलिसवालों को बचाने में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं.
अगर ये दोनों संगठन पुलिस में घुस आयी बुराइयों के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे, तो इसका न केवल अच्छा संदेश समाज में जायेगा बल्कि पुलिस का मोरॉल भी ऊंचा होगा. साथ ही पुलिस को अपने विभागीय स्तर पर भी सुधार लाने की जरूरत है. पुलिस की वरदी जब दागदार होती है, तो बहुत हल्ला होता है. बड़े पुलिस अधिकारी भी सख्त कार्रवाई का एलान करते है, लेकिन सख्त कार्रवाई के नाम पर लंबी प्रक्रिया चलती रहती है. इससे लोगों में न्याय की उम्मीद धूमिल पड़ जाती है. इस तरह के मामले में आरोपी अधिकारियों के खिलाफ प्रक्रिया चलाने का इंतजाम अलग से होना चाहिए ताकि पूरी प्रक्रिया एक तय समय सीमा के अंदर पूरी हो. इसका असर यह होगा कि दोषी अधिकारियों को खुद विभाग समय पर दंडित करेगा. इससे लोगों में पुलिस के प्रति विश्वास बढ़ेगा और आम लोगों दुख भी दूर होगा.
