प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
नीति और दिशा के स्तर पर यूपीए और एनडीए की सरकार में कोई बड़ा फर्क नहीं है. अंतर केवल राजनीतिक स्तर पर है. मोदी सरकार के ऊपर कोई दस जनपथ नहीं है और न कोई राष्ट्रीय सलाहकार परिषद है. नयापन है तो विपक्ष में.
गेहूं या चावल के एक-दो दाने देखकर पहचान हो सकती है, पर क्या सरकार के काम की पहचान एक महीने में हो सकती है? सन 2004 के मई में जब यूपीए-1 की सरकार बनी, तो पहला महीना विचार-विमर्श में निकल गया. तब भी सरकार के सामने पहली चुनौती थी महंगाई रोकना और रोजगार को बढ़ावा देना. इस सरकार के सामने भी वही चुनौती है. मनमोहन सिंह सरकार के सामने भी पेट्रोलियम की कीमतों को बढ़ाने की चुनौती थी. उसके पूर्व वाजपेयी सरकार ने पेट्रोलियम की कीमतों को बाजार के उतार-चढ़ाव से सीधा जोड़ दिया था, पर चुनाव के ठीक पहले कीमत बढ़ने से रोक लिया, जैसे इस बार यूपीए सरकार ने रेल भाड़ा बढ़ाने से रोका. इसे राजनीति कहते हैं.
मोदी सरकार को क्या कोई ‘हनीमून पीरियड’ मिलना चाहिए? उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह की बातें कीं, उनसे लगता था कि वे आते ही सब कुछ ठीक कर देंगे? पर यह तो चुनाव प्रचार की बात थी. दावे कांग्रेस के भी इसी प्रकार के थे. लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के वक्तव्यों में व्यावहारिकता है. राष्ट्रपति के अभिभाषण और धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के जवाब में मोदी ने कहा कि हम पिछली सरकारों के अच्छे काम-काज को आगे बढ़ायेंगे और इस सदी को भारत की सदी साबित करेंगे. उन्होंने विपक्ष की ओर देखते हुए कहा कि हमें आपका समर्थन भी चाहिए. हमसे पहले की सरकारों ने भी अच्छा काम किया है. हम उसमें कुछ नया जोड़ने की कोशिश करेंगे.
नीति और दिशा के स्तर पर यूपीए और एनडीए की सरकार में कोई बड़ा फर्क नहीं है. अंतर केवल राजनीतिक स्तर पर है. मोदी सरकार के ऊपर कोई दस जनपथ नहीं है और न कोई राष्ट्रीय सलाहकार परिषद है. नयापन है तो विपक्ष में. पहले सरकार कमजोर थी और विपक्ष मुखर था. अब सरकार ताकतवर है और विपक्ष खामोश. कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष के स्वर हैं. इधर एके एंटनी ने कांग्रेस के अति अल्पसंख्यक-मुखी होने को लेकर जो टिप्पणी की है, वह एक नयी बहस को जन्म देने वाली है. दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी के गैर-सत्ताधारी मिजाज को लेकर जो कुछ कहा है, उसके गूढ़ अर्थ निकाले जा रहे हैं.
अभी तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सीधा हस्तक्षेप भी सरकारी काम-काज में दिखायी नहीं पड़ा है. चुनाव के ठीक पहले तक मुखर भाजपा की भीतरी गुटबाजी फिलहाल छिप गयी है. अभी मंत्रिमंडल का एक महत्वपूर्ण विस्तार बाकी है, इसलिए उम्मीद लगाये बैठे नेता खामोश हैं. सत्ता की राजनीति में कार्यकर्ताओं को इनाम-इकराम की जरूरत होती है. मोदी सरकार ने जनता से ‘कड़वी गोली’ की बात कहने के बाद कुछ कड़वे फैसले भी करके दिखा दिये. राजनीतिक सतह पर सरकार जोखिम उठाने को तैयार है. सरकार फैसले करती नजर आती है.
रेलवे के किराये-भाड़े में हुई वृद्धि से जनता नाराज जरूर है, पर उसने सरकार को खारिज नहीं किया है. उसे बजट से उम्मीदें हैं. सच यह है कि तीन-चौथाई साल गुजर चुका है. तमाम व्यवस्थाएं पहले से हो चुकी हैं. बजट से लोगों को तीन-चार उम्मीदें हैं. पहली है, आयकर सीमा बढ़ने की. वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद कह चुके हैं कि आयकर की सीमा दो लाख से बढ़ाकर पांच लाख रुपये सालाना होनी चाहिए. क्या वे ऐसा कर पायेंगे? यह बेहद मुश्किल काम है. ऐसा होने का मतलब है, तकरीबन तीन करोड़ लोग टैक्स के दायरे से बाहर हो जायेंगे. सरकार के सामने राजकोषीय घाटे को पांच फीसदी से नीचे लाने की चुनौती है. एक लाख करोड़ से ऊपर की सब्सिडी को घटाने पर अलोकप्रिय होने का खतरा है.
अर्थव्यवस्था धीमी गति से बढ़ रही है. संभावना है कि सरकार गरीबों के स्वास्थ्य की गारंटी की कोई योजना लेकर आयेगी. गुजरात में मोदी सरकार की दो स्वास्थ्य योजनाएं खासतौर से लोकप्रिय हुईं. एक चिरंजीवी योजना, जिसके तहत बाल मृत्युदर को कम करने की कोशिश की गयी, और दूसरी है मुख्यमंत्री अमृतम योजना, जिसके तहत गरीबों के इलाज के लिए दो लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा किया जाता है. गुजरात तथा देश के कुछ अन्य राज्यों में 108 एंबुलेंस योजना सफल हुई है. संभवत: उसे पूरे देश में लागू करने की कोई घोषणा हो. हरेक राज्य में एम्स बनाने, ‘मच्छर मुक्त भारत’ बनाने, ब्रॉडबैंड हाइवे, सौ नये शहर, चौबीस घंटे बिजली-पानी जैसे वादे हुए हैं, पर ऐसे वादे अगले कुछ महीनों में पूरे होने से रहे. पर उस दिशा में कुछ बढ़ सके, तो यह नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि होगी.
खबर है कि महंगाई की दो कड़वी खुराक देने के बाद सरकार और झटके देने के मूड में नहीं है. सरकार रसोई गैस और मिट्टी के तेल पर अंडर-रिकवरी को कम करने के लिए डीजल फॉर्मुले को अपनाने पर विचार कर रही है. यानी रसोई गैस व मिट्टी तेल पर जारी भारी सब्सिडी का बोझ धीरे-धीरे कम किया जायेगा. यह रास्ता पिछली सरकार ने ही निकाला था. पिछले साल जनवरी में तेल विपणन कंपनियों को डीजल की अंडर-रिकवरी कम करने के लिए हर माह 50 पैसे प्रति लीटर तक बढ़ोतरी करने की छूट दी थी. सितंबर में डीजल पर 14.50 रुपये की सब्सिडी थी, जो अब घटती हुई 1.62 रूपये प्रति लीटर ही रह गयी है. पेट्रोल पहले ही नियंत्रण से मुक्त है.
पर रसोई गैस के सिलेंडर पर अंडर रिकवरी 433 रुपये है. इसे कम या खत्म करने के लिए बाजीगरी जैसे कौशल की जरूरत है. ईंधन की कुल एक लाख 15 हजार 548 करोड़ रुपये की सब्सिडी में से आधी रसोई गैस पर है. एक बाजीगरी सरकारी उपक्रमों के विनिवेश में देखने को मिलेगी. स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) से इसकी शुरुआत होने जा रही है. यूपीए सरकार ने पिछले वित्त वर्ष में सेल में 10.82 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया था. शेयर बाजार की खराब हालत के कारण वह मार्च, 2013 में 5.82 फीसदी शेयर ही बेच पायी. इससे सरकार को 1,516 करोड़ रुपये मिले थे.
बाकी बचे 5 फीसदी अब बेचे जायेंगे. संयोग से शेयर बजार खुश है. जनता की खुशी और नाराजगी बड़ी बातों को लेकर नहीं होती. उसका मसला है महंगाई और रोजगार. सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सामग्री की कीमतों को लेकर है, जो मानसून के अच्छे या बुरे होने पर बढ़ती-घटती हैं. अच्छे या बुरे दिनों का मुहावरा अनाज की कीमतों से जुड़ा है. इनसे पार पा लिया तो विनिवेश, पूंजी निवेश, रक्षा खरीद, नाभिकीय ऊर्जा और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े काम संभव हैं. ये काम बड़े हैं और उनके सहारे ही अर्थ-व्यवस्था की प्रगति संभव है. इंतजार करें, अगले सोमवार का, जब सरकार की पहली परीक्षा होगी.
