-स्मृति : नारायण दत्त जी-
– हरिवंश-
हिंदी की सबसे प्रख्यात और स्तरीय पत्रिका नवनीत के लंबे समय तक संपादक रहे नारायण दत्त जी का रविवार की सुबह बेंगलुरु में निधन हो गया था. उनके संपादन में प्रकाशित नवनीत, हिंदी पत्रकारिता के जीवन के ऊंचे आदर्श और मूल्य स्थापित करनेवाली पत्रिका बनी.
वह आवाज, जो तकरीबन हर सप्ताह-पंद्रह दिनों पर सुनता था, ‘कै से हो? परिवार कैसा है?..’ एक-एक का नाम लेकर पूछते थे. वह आवाज अब नहीं सुन सकूंगा. यह खबर थी, बेंगलुरु, मुंबई और कोलकाता के मित्रों से. वह स्नेहपूर्ण भावपूर्ण आवाज होती थी, नारायण दत्त जी की, जिन्हें हम आदर से भाई साहब कहते थे.
पिछले 37 वर्षों से उनके भावपूर्ण स्नेह की छाया मिली. आज बाजार की दुनिया में, जब हर रिश्ते के पीछे का आर्थिक या स्वार्थ गणित महत्वपूर्ण बन गया है. तब यह एक ऐसा रिश्ता था, जिसमें स्नेह, आत्मीयता, सात्विक भाव के अलावा कुछ था भी नहीं. नारायण दत्तजी के प्रति एक अद्भुत श्रद्धा (एक हद तक अंधभक्ति) थी कि इनसान उतना ऊंचा हो सकता है? न खून का रिश्ता, न धर्म का, न क्षेत्र का, न जाति का.. पर इन सब रिश्तों से बड़ा.
कौन थे, नारायण दत्त जी ?
मूलत: कन्नड़ भाषी. अभिजात्य ब्राह्मण कुल से. पिता मैसूर महाराज के यहां अच्छे ओहदे पर थे. पर पिता ने ही गांधी के प्रभाव में ब्राह्मणवादी ताना-बाना और विशिष्टता सब छोड़ दिया. उन्हीं पिता के पुत्र थे, नारायण दत्त जी. वह एचवाई शारदा प्रसाद जी के छोटे भाई भी थे. कुल चार भाई थे. सब एक से एक विलक्षण, प्रतिभावान और विशिष्ट. एचवाई शारदा प्रसाद जी ने नेहरू जी के भाषणों का संकलन किया. इंदिरा जी के प्रेस सलाहकार रहे. नौकरशाही में उनका महत्व और असर कैसा था, यह बिशन टंडन (इंदिरा जी के समय प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव रहे) ने अपनी पुस्तक में बताया है. बिशन जी ने एक बार निजी बातचीत में कहा था कि उनका नैतिक सत्व और असर इतना था कि कैबिनेट सेक्रेटरी उनसे बात करने से हिचकते थे.
जिनसे हमने पत्रकारिता व मूल्य-संस्कार सीखे
वह (शारदा प्रसाद जी) कन्नड़ के श्रेष्ठ गद्य लेखकों में से भी थे. कुछेक वर्षों पहले मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने उनके कन्नड़ लेखों के संकलन का लोकार्पण किया था. उनकी विशिष्टता का बखान भी. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में पत्रकारिता की. हार्वर्ड पढ़ने गये. नेहरू जी के साथ रहे. इंदिरा जी के प्रेस सलाहकार बने. फिर जब जनता पार्टी का शासन आया, तब मोरारजी ने भी उन्हें सम्मानित पद पर रखा. पुन: इंदिराजी वापस लौटीं, तो शारदा प्रसाद जी उनके प्रेस सलाहकार बने. राजीव गांधी के कार्यकाल में भी रहे. दरअसल वह भी ऋषि परंपरा के इंसान थे. अपने समय में सत्ता की दुनिया में उन्हें सबसे ताकतवर माना गया, जिनका आदर विपक्ष के प्रधानमंत्री ने भी किया. पर वह जीये एकदम सामान्य आदमी की तरह. न पद का अहंकार, न विद्वता का बोझ. खांटी गांधीवादी. लगभग तीन-चार वर्ष पहले शारदा प्रसाद जी नहीं रहे.
तब उनके छोटे भाई नारायण दत्तजी उनके दिल्लीवाले घर पर थे. उनसे मिलने गया. देख कर स्तब्ध रहा कि दिल्ली से लगभग 30-40 किलोमीटर दूर एक मामूली जगह पर दो कमरों का साधारण फ्लैट. उस रुतबे, प्रभाव और योग्यता के लोग कहां से कहां पहुंच गये? पर शारदा प्रसाद जी वैसे ही रहे. सरल, विनम्र और गंभीर. नारायण दत्तजी भी वैसे ही थे. हमेशा उन्हें सफेद खद्दर के कुरते-पायजामे में ही देखा. गौरवर्ण, सुंदर काया, स्नेहपूर्ण वाणी, वही चिर-परिचित मुस्कान. अविवाहित, कई भाषाओं (गुजराती, मराठी, तेलुगु, तमिल, संस्कृत और कन्नड़ तो उनकी मातृभाषा ही थी) के जानकार. पर कहीं अहम या विद्वता का बोझ नहीं. युवा से युवा व्यक्ति से भी संपर्क और आत्मीयता.
बहुत बाद में प्रख्यात पत्रकार राजेंद्र माथुर का एक संस्मरण पढ़ा, राहुल बारपुते पर. इसमें उल्लेख था कि विंध्य के उत्तर का अहं या दंभ, विंध्य के दक्षिण में नहीं है. बाद में खुद समझा कि विंध्य के उत्तर और विंध्य के दक्षिण में एक फर्क है. इस संदर्भ में माथुर साहब ने दक्षिण की विनम्रता, शिष्टता, मर्यादा और मूल्यों का उल्लेख किया था. उत्तर में एक अघोषित अहंकार, रूखापन और अकड़ है. अपवाद हैं, पर गंगा की धरती की यह मुख्यधारा है. कई बार सोचता हूं, नारायण दत्तजी की यह विद्वता हिंदी इलाके के पत्रकार या संपादक में होती, तो वह आज कहां पहुंचा होता? जो पासंग में नहीं थे, वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ कर भौतिक संदर्भ में शीर्ष पर पहुंच गये. पर नारायण दत्तजी जैसे थे, वैसे ही आजीवन बने रहे. वह अविवाहित थे, पर देश भर में उनका परिवार फैला था. हर जाति, धर्म के क्षेत्र में उन्हें चाहनेवाले थे. उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह से पत्रकारिता शुरू की. फिर नवनीत (1967-80 तक) के संपादक रहे. अगर श्रेष्ठ संपादन कला और समझ विकसित करनी हो, तो उनके संपादन में निकलनेवाले नवनीत के अंक पलट लीजिए. आज भी यह मानक है. हमने बंबई (अब मुंबई), 1981 में छोड़ दी थी. पर प्राय: जाना होता था. तब नारायण दत्तजी कोलाबा में एक कमरे में किराये पर रहते थे. उसी कमरे से एचवाई शारदा प्रसाद जी और नारायण दत्तजी ने मुंबई में जीवन आरंभ किया था. कुछेक वर्षों बाद शारदा प्रसाद जी हार्वर्ड, फिर दिल्ली चले गये. पर नारायण दत्तजी बंबई छोड़ने तक वहीं रहे. मैं उनसे सपरिवार मिलने जाता. प्राय: हमारे मित्र अनुराग भी साथ होते. वह प्रेमवश छेड़ते, भाई साहब आप जब यह कमरा छोड़ेंगे, तो इसे मुझे किराये पर दे दीजियेगा (याद रखिए, वह कई दशकों से उसी कमरे में किराये पर रहे. कोई दूसरा होता, तो उस इलाके की संपत्ति का मूल्य देख कर करोड़ों लेकर वह मकान मालिक को सौंपता). भाई साहब अपनी मद्धिम पर मधुर आवाज में साफ-साफ कहते कि अब तुम मेरा धर्म बिगाड़ने का प्रलोभन दे रहे हो. बताने की जरूरत नहीं कि उन्होंने चुपचाप मकान मालिक की दूसरी या तीसरी पीढ़ी के उत्तराधिकारी को चाबी सौंपी और तीन दशकों से अधिक समय वहां (मुंबई) रहने के बाद बेंगलूर चले गये. उनके कमरे में पुस्तकों का ढेर देख कर लगता कि वह पुस्तकों के बीच रहते, सोते हैं. पर एक-एक चीज करीने से रखी. साफ-सुथरी व व्यवस्थित. उनके कमरे को देख कर मोहम्मद करीम छागला के अद्भुत संस्मरण ‘रोजेज इन दिसंबर’ (दिसंबर में गुलाब) का एक प्रसंग सजीव हो जाता. राधाकृष्णन राष्ट्रपति थे. दार्शनिक. उनके कमरे में बिस्तर या चौकी (बेड) पर किताबों का ढेर होता. बगल में वह सोते. कोई उन पुस्तकों के ढेर साफ करना चाहता, तो वह मना कर देते. कहते, इन पुस्तकों को मैं अपने ढंग रखता हूं. इस व्यवस्था में ही एक आत्मीयता-राग है. यह जैसे है, वैसे ही रहने दें. इसी तरह नारायण दत्तजी के पुस्तकों के ढेर देखने में अद्भुत आंतरिक उल्लस होता. उनके साथ होने से आध्यात्मिक आनंद का एहसास रहता. वह गुरुकुल से पढ़े थे.
आर्य समाज और गांधी का गहरा असर था. पर वह अनीश्वरवादी थे. एक बार ऐसी ही एक मुंबई यात्रा में उनसे अनुरोध किया कि भाई साहब, नवनीत के पुराने अंक मुझे दीजिए. एक क्षण गौर से उन्होंने मुझे देखा और कहा- ‘कौन अब इसको पढ़ता है या याद रखता है? मैं घर से बहुत चीजें हटा चुका हूं. जीवन में चीजें समेट रहा हूं. कुछेक बची हैं, तुम ले जाओ.’ नवनीत के वे कुछ दुर्लभ अंक आज मेरे निजी संकलन की पवित्र धरोहरों में से हैं. संपादन कला की श्रेष्ठता का नमूना. विश्व की सर्वश्रेष्ठ कृतियों का अनुवाद वह इस पत्रिका में छापते थे. मनुष्य के मर्म को ढूंढनेवाली कृतियां. इस पत्रिका के नैतिक पाठ आभा-संस्कार ने अपने दौर के अंधेरे में वह रोशनी प्रज्वलित की, तो आज भी राह दिखाती है. नवनीत में जिन पुस्तकों की समीक्षा छपती, उन पुस्तक को वह पूरा पढ़ चुके होते. नवनीत में वह हमेशा दूसरों से लिखवाते, पर एक-एक शब्द खुद देखते. सख्त संपादन. कहीं अपना नाम नहीं देते थे. नवनीत के बाद वह पीटीआई हिंदी फीचर सर्विस के प्रमुख (1981-1993 तक) रहे. अपने समय की सर्वश्रेष्ठ फीचर सर्विस. वह जिस काम को संभालते, उस पर उनकी छाप होती. धर्मयुग में भी काम किया. हममें से किसी को वहां काम करते संपादन या शब्दों के चयन में शंका होती, तो भाई साहब हमारे चलते-फिरते ज्ञानकोष थे. प्रभात खबर में प्राय: लिखते रहे. हिंदू अखबार या दक्षिण भारत के अन्य श्रेष्ठ लेखों का अनुवाद कर प्रभात खबर में भेजते रहे. प्रभात खबर में उन्होंने एक लंबा लेख लिखा कि कैसे उत्तर भारत के लोग, दक्षिण के नामों का गलत ढंग से उच्चारण करते हैं या लिखते हैं. उनकी देख-रेख में निकली पुस्तक नवनीत सौरभ संकलनयोग्य दुर्लभ पुस्तकों में से है. अब तो शायद मिले भी न. परिवार और समाज आज जिस नैतिक नैतिक द्वंद्व व मूल्यों के संकट से गुजर रहे हैं, उसमें राह दिखानेवाली पुस्तक. बनारसी दास चतुर्वेदी के पत्रों का दो खंडों में संपादन अपने युग की कथा है. ये कृतियां पीढ़ियों या समाज को नये संस्कार या मूल्य देनेवाली हैं.
पर आशय यह बताना नहीं है कि नारायण दत्तजी कहां-कहां रहे और क्या किया या वह किस तरह के मनीषी या ऋषि संपादक थे. या उनकी विद्वता क्या थी? उनसे पहली मुलाकात हुई 1977 में. स्वर्गीय गणेश मंत्री जी के सौजन्य से. हम सब धर्मयुग में काम करते थे. गणेश मंत्री अत्यंत प्रखर, तेजस्वी और ईमानदार पत्रकारिता के प्रतिमान थे. नारायण दत्तजी तब नवनीत के संपादक थे. ताड़देव (मुंबई) की उस पुरानी इमारत की पहली मंजिल पर था, नवनीत का दफ्तर. बाहर उनके सहयोगी बैठते थे और भीतर के कमरे में खुद नारायण दत्तजी. किताबें और कागज से भरा कक्ष. वहीं गणेश जी और विश्वनाथ सचदेव (धर्मयुग के पूर्व संपादक) हमें ले गये और भाई साहब (नारायण दत्तजी) से मिलाया. यह 1977 बरसात की बात है. मुंबई की बरसात यादगार होती है, इसलिए बरसात की इस मुलाकात की स्मृति रह गयी.
तब तक सुन चुका था कि जयप्रकाश जी ने नारायण दत्तजी से मिलने की इच्छा प्रकट की थी. नारायण दत्तजी स्वभाव से संकोची थे. मौजूदा पत्रकारों के बिल्कुल विपरीत. जयप्रकाश जी ने इमरजेंसी में एक कविता लिखी थी. चिड़िया को प्रतीक बना कर. एक था चिड़ा, एक थी चिड़ी.. शायद कुछ ऐसा ही. अपनी यह कविता, प्रकाशन के लिए उन्होंने कुछ संपादकों को भेजी. पर इस कविता के महत्व पर किसी ने गौर नहीं किया. इमरजेंसी में लिखी गयी कविता थी. प्रतीक के तौर पर नारायण दत्तजी ने इसे बहुत सुंदर तरीके से नवनीत में छापा. इसके महत्व को देख कर. जयप्रकाश जी को लगा कि इस भीड़ में कोई व्यक्ति है, जो मेरे मनोभाव पहचान सका है. उन्होंने नारायण दत्तजी को आमंत्रित किया. भाई साहब संकोच के साथ मिलने गये. जेपी से कहा, मैं मुख्यधारा का पत्रकार नहीं हूं.
बंबई छूटी. हैदराबाद रहा, कुछेक दिनों के लिए पटना भी. फिर कोलकाता वगैरह. पटना में भी वह मिलने आये और कोलकाता भी साथ रहने आये. 1980-81 की घटना है. मुंबई में वह गोरेगांव से लौट रहे थे. होली का दिन था. उन्हें आंख में कंकड़ से चोट लगी. इससे वह आजीवन परेशान रहे. तब बंबई अस्पताल में उनके आंख का आपरेशन हुआ. उनके साथ रात में हम कुछ मित्र क्रमवार रहते थे. वह बार-बार मना करते. पर हम सब रहते. वह अस्पताल में ही थे कि एक दिन टाइम्स के धर्मयुग दफ्तर (तब धर्मयुग का दफ्तर टाइम्स बिल्डिंग की चौथी मंजिल पर था) में अचानक एक दोपहर देखा कि 4-6 लोग आ रहे हैं. दो लोग आगे हैं और उनके पीछे कंपनी के तत्कालीन महाप्रबंधक और कई बड़े प्रभावी लोग. निगाह उधर अटक गयी. आगे चल रहे व्यक्ति एक पुर्जा लिये हुए थे. उन्होंने पास खड़े एक व्यक्ति से पूछा कि धर्मयुग में हरिवंश, अनुराग चतुर्वेदी और राजन गांधी कौन हैं? हम मामूली लोग हतप्रभ थे कि हमारे ये असाधारण अतिथि कौन हैं, जिनके पीछे हमारी कंपनी के बड़े और प्रभावी लोग पंक्तिबद्ध खड़े हैं. पता चला कि वह प्रधानमंत्री इंदिराजी के प्रेस सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद जी हैं. अपने छोटे भाई नारायण दत्तजी को देखने बंबई अस्पताल आये थे. नारायण दत्तजी ने हम सबका नाम बताया. उन्होंने कहा कि हम इन तीन लोगों से मिलेंगे और नारायण दत्त की देखरेख के लिए उन्हें धन्यवाद देंगे. हम तो जड़ और स्तब्ध थे. क्योंकि एचवाई शारदा प्रसाद जी का नाम सुना था. महत्व जानते थे. उनकी नैतिकता-विद्वता और पद का डंका बजता था. हड़बड़ाहट में हमने उनसे सामने की मामूली कुरसी पर बैठने का आग्रह किया. वह बैठे. तब टाइम्स में 10 पैसे वाली चाय मिलती थी. वही हमलोगों ने उन्हें आफर किया. उन्होंने बैठ कर चाय पी और बहुत धन्यवाद दिया. आज जब वह तहजीब याद करता हूं तो विंध्य के उत्तर की संस्कृति और विंध्य के दक्षिण की संस्कृति का फर्क कुछ और अच्छी तरह समझ में आता है.
हर सप्ताह या पंद्रह दिनों में नारायण दत्तजी फोन करते. पूछते कि यह पढ़े हो? अमुक किताब देखी है? हिंदू का यह लेख है, चाहो तो अनुवाद कर भेज दूं. हम जैसे लगभग अयोग्य लोग अगर जीवन में कुछेक सीढ़ी चढ़ सके, तो वह कंधा नारायण दत्तजी जैसे लोगों का ही रहा. वह इंसान की ऊंचाई का पैमाना थे. कभी किसी के बारे में न शिकायत, न पीठ पीछे चर्चा. उनकी विनम्रता में भी एक सात्विक गंभीरता और मर्यादा रहती थी. प्राय: बेंगलूर जाता, तो उनसे मिलता. बल्कि बेंगलूर जाने का वह एक आकर्षण थे. वह अकेले रहते थे. पास में ही भाई-बहन का घर था. पर कहते निजी स्वतंत्रता मुझे प्रिय है. जब तक खुद अपने पैरों पर खड़ा रह सकता हूं, अकेले रहना चाहता हूं. बाद के दिनों में छोटे भाई उन्हें घर पर ले गये. फिर भी वह दिन में कोशिश करते कि अपने जेपी नगर के किराये के कमरे में आकर रहें. किसी के आने पर खुद चाय बना कर पिलाते. चाहे भारतीय संस्कृति की बात हो या आजादी की लड़ाई की चर्चा, उतना पढ़ा या जानकार व्यक्ति हमें दूसरा नहीं मिला. बहुत पहले जब बंबई रहना होता था, तो एक बार उनके साथ बैठ कर सूची बनायी कि गांधी कैसे पारस पत्थर थे कि उनके स्पर्श से मिट्टी भी सोना बनी. लगभग आठ लोगों के नाम की हमने एक सूची बनायी, जो योग्यता, प्रतिभा, त्याग में कहीं नेहरू से कम नहीं थे. जिन लोगों को नेहरू जी अपने मंत्रिमंडल में रखना चाहते थे, लेकिन इनमें से कोई उनकी सरकार में नहीं गया. समाजसेवा में लगा रहा. भाई साहब की स्मृति अद्भुत थी. कम लोग होते हैं, जिनसे मिलने की उत्सुकता होती है. बेंगलूर जाता, तो वह एक पुराने ढंग के कन्नड़ रेस्त्रां में ले जाते, जहां की कॉफी बहुत उम्दा थी. फिर देश-दुनिया की बातें. लगभग चार माह पहले बेंगलूर में उन्हें देखा, तो धक्का लगा. वह पुराने दुबले-पतले तो थे ही और कमजोर हो गये थे.
नारायण दत्तजी को देश के बड़े पुरस्कार मिले. राजीव गांधी ने उन्हें सम्मानित किया. अटल जी ने सम्मानित किया. उत्तर प्रदेश सरकार ने सम्मानित किया. उन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान भी मिला. पर इन सभी सम्मानों से वह ऊपर थे. वह हमारे श्रद्धेय कृष्णबिहारी जी (प्रख्यात साहित्यकार, मनीषी व निबंधकार) के अत्यंत आत्मीय रहे. दोनों के बीच की बातचीत को सुनना, मनुष्य की ऊंचाई-श्रेष्ठता के एक नये प्रतिमान को जानना था.
टीएस इलियट ने लिखा है – मेरे प्रारंभ में ही मेरा अंत था. हम सब पैदा हुए हैं. हम सब के आरंभ में ही हमारा अंत भी है. आदमी सिर्फ जीवन ही नहीं जीता, मृत्यु भी जीता है. पर नारायण दत्तजी का जाना निजी संदर्भ में एक ऐसी क्षति है, जिसने इंसान की ऊंचाई के एक जीवंत प्रतीक को उठा लिया है. जिन लोगों से पत्रकारिता सीखी, संस्कार-मूल्य सीखे, उनमें से कई अब नहीं रहे. धर्मवीर भारती, गणेश मंत्री, अजीत भट्टाचार्जी, प्रभाष जोशी, सुरेंद्र प्रताप सिंह, उदयन शर्मा, श्यामा प्रसाद प्रदीप वगैरह. पर नारायण दत्तजी के होने से लगता था कि एक अलग मानवीय व सात्विक दुनिया का जीवंत साक्ष्य आसपास मौजूद है. पर चार दिन पहले वह भौतिक शरीर भी नहीं रहा.
