जहां इस युग में इनसान चांद और मंगल घूमने का तैयार है, वहीं कोई इनसान किसी दूसरे का मैला ढो रहा है, यह कितना शर्मनाक है! यह सुनकर ही अपराधबोध होता है. देश में एक तरफ चमचमाती गगनचुंबी इमारतें तैयार हो रहीं हैं, वहीं देश की एक हकीकत यह भी है कि आजादी के छह दशक बाद भी यहां मैला ढोने की प्रथा जारी है और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, आज भी हजारों लोग इस तरह जीवन-यापन कर रहे हैं. उन्हें जीवन र्पयत समाज की हेय दृष्टि का सामना करना पड़ता है.
उनके सामने भी मजबूरी है कि अगर वे यह न करें, तो उनके बच्चों को खाना नसीब नहीं होगा. ऐसे लोग अपनी अगली पीढ़ी को इस जिल्लत की जिंदगी से निजात दिलाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. सरकार ने 1993 में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन आज भी यह जारी है. यह विडंबना नहीं तो क्या है?
मो इमरान, चतरा
