अकर्मण्य हुआ बुद्धिजीवी वर्ग

भारतीय समाज स्त्रियों के लिए किसी यातना गृह से कम नहीं. यहां संस्कार, परंपरा, धर्म, घर की इज्जत के नाम पर उन्हें उम्र भर के लिए यातना की जंजीर पहना दी जाती है. सबसे बड़ी बात कि ये यातनाएं गैरों से ज्यादा अपने देते हैं. कुछ सामाजिक क्रांति के मशालवाहक जो कभी सामाजिक उत्थान के […]

भारतीय समाज स्त्रियों के लिए किसी यातना गृह से कम नहीं. यहां संस्कार, परंपरा, धर्म, घर की इज्जत के नाम पर उन्हें उम्र भर के लिए यातना की जंजीर पहना दी जाती है. सबसे बड़ी बात कि ये यातनाएं गैरों से ज्यादा अपने देते हैं. कुछ सामाजिक क्रांति के मशालवाहक जो कभी सामाजिक उत्थान के लिए लंबे-चौड़े व्याख्यान दिया करते थे, उनके भी पैर फिसलने लगे हैं और अपने सिद्धांतों से समझौता कर शोषण के खिलाफ लड़ते-लड़ते शोषक बन रहे हैं.
गहराई से देखें तो समाज का बुद्धिजीवी वर्ग जो कभी सामाजिक उत्थान की रीढ़ का काम करता था और समाज को विकृत करने वाले कारकों से रक्षा करता था, आज अकर्मण्य हो चुका है, जिससे समाज में आज विकृतियां तेजी से फैल रही हैं. स्त्री को भोग की वस्तु समझने की मानसिकता खत्म किये बिना एक बड़ी सामाजिक क्रांति असंभव है.
हरिश्चंद्र कुमार, पांकी

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