खूंटी जिले के कोचांग में लड़कियों के साथ जो कुछ अमानवीय कृत्य हुआ, उसके बाद के प्रशासन, सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार आयोग के प्रयासों-कार्रवाइयों से ऐसा नहीं लगता है कि खू्ंटी में कानून का राज है.
अब तक घटना स्थल पर जाने की हिम्मत न तो मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने जुटायी, न पुलिस के आला अफसर ने. यह क्या संकेत करता है? क्या ऐसे में असामाजिक-अराजक तत्वों में कानून का खौफ पैदा होगा? क्या इस हाल में सुदूर ग्रामीण-जंगली इलाकों में रहने वाले लोग और महफूज हैं? जाहिर है, इससे हालात अंदरूनी तौर पर और बिगड़ेंगे. सरकार और आला अफसरों को इस पर विचार करना चाहिए.
युगल किशोर, ई-मेल से.
