गांधीवाद : एक अमोल विरासत

घरेलू राजनीति जब आपसी व व्यक्तिगत विद्वेष का शिकार हो जाये, वहां गांधी याद न आएं, यह हो नहीं सकता. गांधीजी का जितना आत्मपक्ष मजबूत था, उतना ही लोकपक्ष पवित्र था. आज के राजनीतिज्ञों में इसका स्पष्ट अभाव दिखता है. गांधीजी के नैतिक आदर्श जितने तब प्रासंगिक थे, उतने आज भी हैं. आज के दौर […]

घरेलू राजनीति जब आपसी व व्यक्तिगत विद्वेष का शिकार हो जाये, वहां गांधी याद न आएं, यह हो नहीं सकता. गांधीजी का जितना आत्मपक्ष मजबूत था, उतना ही लोकपक्ष पवित्र था. आज के राजनीतिज्ञों में इसका स्पष्ट अभाव दिखता है. गांधीजी के नैतिक आदर्श जितने तब प्रासंगिक थे, उतने आज भी हैं. आज के दौर में बहुसंख्यक कट्टरवाद सरकार के संरक्षण में उभर रहा है. गौ हत्या के नाम पर लोग मारे जा रहे हैं. समाज के सबसे निम्न तबके को दबाया जा रहा है. धार्मिक उन्माद, जातिवादी हिंसा का राजनीतिक प्रयोग सामाजिक टूटन की ओर अग्रसर कर रहा है. गांधी का विचार नैतिकता व सदाचरण पर आधारित है. गांधीजी का कहना था कि हम किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय के हो सकते हैं, पर हमें प्रेम, स्नेह और सहयोग की भावना से कार्य करना है और आगे बढ़ना है. जब सामाजिक समरसता के सारे हथियार चूक जाएं, वहां से गांधी विचार की उपयोगिता प्रारंभ होती है. गांधीवाद एक अनमोल विरासत है, जिसे हमें अक्षुण रखना होगा.
डा अमरजीत कुमार, दुर्गापुर

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