अगर इवीएम (इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन) की तकनीकी खराबियों के कारण उपचुनाव में मतदान बाधित हो सकता है, तो विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में ऐसा नहीं होने की क्या गारंटी है?
चुनाव आयोग के सामने सबसे कठिन सवाल यह आन खड़ा हुआ है. इस बार करीब सभी प्रमुख पार्टियों की शिकायत है कि इवीएम की गड़बड़ी से मतदान में देरी हुई तथा इसे अधिकारियों और आयोग ने भी माना है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव इसका महापर्व है.
महापर्व कहने के पीछे सोच यह है कि चुनाव की तारीख के निर्धारण से लेकर मतदान और परिणामों की घोषणा तक की पूरी प्रक्रिया को नियमित और पारदर्शी बनाये रखना कुछ उतना ही कठोर है, जितना कि किसी पर्व के विधि-विधानों का पालन करना. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बीते कुछ समय से गड़बड़ियों की शिकायतें बहुतायत में सुनने को मिल रही हैं और ऐसी ज्यादातर शिकायतों का रिश्ता इवीएम से जुड़ा हुआ है.
मतपत्रों की लूट, बूथों पर कब्जा, मतपेटियों की छीन-झपट और फर्जी मतदान जैसी घटनाएं तो अब बीते जमाने की बात हुईं. ऐसा चुनाव आयोग के ठोस कदमों के कारण ही संभव हुआ है.
इसमें एक उपाय है मशीन के जरिये मतदान. लेकिन मशीन का इस्तेमाल सर्वथा निरापद हो, ऐसी बात नहीं. एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग ने चुनावी महापर्व की पवित्रता को दशकों से बखूबी निभाया है, लेकिन फिलहाल उसे नयी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
इवीएम कभी देरी से पहुंचते हैं, तो कभी उनमें खराबी आ जाती है. दूसरे, इवीएम को लेकर अनेक पार्टियों और मतदाताओं के बीच संदेह भी बना चला आ रहा है कि वोट सही जगह जा रहे हैं या नहीं? इस संदेह को दूर करने के लिए चुनाव आयोग ने सीमित पैमाने पर वीवीपीएटी (मतदाता के समक्ष सत्यापित हो सकनेवाले पेपर ऑडिट ट्रेल) की व्यवस्था की है, लेकिन हालिया चुनावों में इसमें भी खामियां निकलीं.
इवीएम की खराबी तथा वीवीपीएटी के इंतजाम में गड़बड़ी एक-दो मतदान केंद्रों तक सीमित नहीं थी. वीवीपीएटी में खराबी कई जगहों पर, 20 फीसदी से भी ज्यादा थी. ऐसी घटनाओं से चुनावी प्रक्रिया के पारदर्शी और नियमबद्ध होने पर सवाल उठते हैं.
चुनाव आयोग यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से कन्नी नहीं काट सकता है कि छोटी-मोटी चूक की अनदेखी की जा सकती है. तर्क दिया गया था कि इवीएम के इस्तेमाल से मतदान करना सरल और पारदर्शी होगा तथा नतीजों के आने में देरी नहीं लगेगी. लेकिन, यह पूरी तरह सही साबित होता नहीं दिख रहा है.
जरूरी यह है कि मशीनों की तकनीक और उनके इस्तेमाल के तौर-तरीकों पर गंभीर विचार-विमर्श कर कमियों को तुरंत दूर किया जाये. यदि ऐसा नहीं किया गया, तो शंकाओं और दिक्कतों से आयोग और चुनावी प्रक्रिया को छुटकारा नहीं मिल सकेगा. यह लोकतांत्रिक भरोसे और पारदर्शिता के लिए ठीक नहीं होगा.
