करीब-करीब हर साल अलग-अलग राज्यों में पंचायत से लेकर विधानसभा और उपचुनाव होते रहते हैं. पार्टियां चुनाव जीतने के लिए नेताओं की पूरी फौज मैदान में उतार देती हैं. इसी फौज में मुख्यमंत्री व मंत्री भी होते हैं, जिन पर जनता की समस्या हल करने की जिम्मेदारी होती है. केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री मंत्रालय छोड़कर चुनाव प्रचार में व्यस्त हो जाते हैं, जिससे जनता के जरूरी कामों पर ब्रेक-सा लग जाता है.
गुजरात चुनाव के बाद अब कर्नाटक चुनाव में 22 मंत्रियों और दो मुख्यमंत्रियों को बीजेपी ने प्रचार के लिए भेजा. चुनाव आयोग को विचार करना चाहिए कि मंत्रियों को तनख्वाह जनता के टैक्स से मिलती है, तो किसी पार्टी विशेष का चुनाव का प्रचार कैसे कर सकते हैं? भले ही किसी पार्टी से संबंध रखते हों, लेकिन मुख्यमंत्री और मंत्री का पद ग्रहण करने के बाद सभी जनता के लिए समान होते हैं. ऐसे में पद की जवाबदेही और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए.
महेश कुमार, इमेल से
