कम बोलें सच बोलें

कविता विकास लेखिका मनुष्यों में समूह-निर्माण की स्वाभाविक प्रक्रिया होती है. जो जिस स्वभाव का होता है, वह उसी के अनुकूल समूह बना लेता है. बीते दिनों मैं एक शोक सभा में गयी थी. वहां सीमित लोगों के जमावड़े में भी नाते-रिश्तेदारों में यह बात देखने को मिली कि तीन-चार लोग मैत्री भाव से मेजबानों […]

कविता विकास

लेखिका

मनुष्यों में समूह-निर्माण की स्वाभाविक प्रक्रिया होती है. जो जिस स्वभाव का होता है, वह उसी के अनुकूल समूह बना लेता है. बीते दिनों मैं एक शोक सभा में गयी थी. वहां सीमित लोगों के जमावड़े में भी नाते-रिश्तेदारों में यह बात देखने को मिली कि तीन-चार लोग मैत्री भाव से मेजबानों की मदद कर रहे हैं, तो कुछ लोग चुपचाप क्रियाकलापों को निहार रहे हैं. दुख की घड़ी में भी एक ग्रुप निंदा-स्तुति में लगा हुआ है.

जीवन में संबंधों की एक नर्म-मुलायम चादर बिछी हुई है, जो इसे संवारना जानता है, वह इसकी कद्र करता है, अन्यथा उधेड़ने में कितनी देर लगती है?

जो हमारे अनुकूल होते हैं, वे हमारे प्रिय होते हैं और जिनसे स्वभाव नहीं मिलता उनकी तरफ से हम लापरवाह हो जाते हैं. कई बार तो उनके प्रति ऐसी उदासीनता भर जाती है कि उनको देखकर हम रास्ता बादल लेते हैं. न वे आत्मीय होते हैं और न वे हमें आत्मीय समझते हैं. ऐसे लोगों को न दुख विचलित करते हैं, न सुख आनंद देते हैं.

कुछ लोग आदतन आलोचक होते हैं और वे हमेशा दूसरों की क्रियाकलापों पर अनावश्यक प्रतिक्रिया देते रहते हैं. वाकई, जो स्वयं असंतुष्ट होता है, वह कभी दूसरे से संतुष्ट नहीं होता. अपने जीवन का बहुलांश हमें समझदारी से अर्जित करना पड़ता है.

ज्ञान अर्जित करना आसान है, पर सबके वास्ते व्यवहार-कुशल होना आसान नहीं. यह हमारे वातावरण और संस्कृतियों के पोषण से मिलता है. अगर हम किसी के आने पर उसका स्वागत करना नहीं सीखे, समर्थ होते हुए भी छोटी-मोटी जरूरतों के लिए दूसरे का मुंह ताकें या अपने को सबसे श्रेष्ठ समझने की भूल करते हुए साधारण वाद-विवाद में भी हावी होने की असफल कोशिश करें, तो यह मूर्खता है. ऐसे लोग, ‘अधजल गगरी छलकत जाये’ का सटीक उदाहरण होते हैं.

जीवन का आनंद तभी मिलेगा, जब हम उसके सकारात्मक पहलुओं को अपनाते हुए उसमें आनंद तलाशेंगे. प्रेम को अंगीकार करना आसान है, पर उसका उत्तर प्रेम से ही देना बहुत कठिन है.

अगर आप आलोचना करने की आदत नहीं त्यागेंगे, तो लोगों को उनके मौलिक रूप में स्वीकार नहीं कर पायेंगे. उस व्यक्ति से प्रेम रूपी रिश्ते की कोई अहमियत नहीं, जो प्रेम तो चाहता है, पर प्रेम देना नहीं जानता.

सब कुछ हमारे मनोनुकूल होगा, तो जीवन में रस नहीं रह पायेगा. इसलिए विपरीत स्वभाव वालों से भी थोड़ी आत्मीयता बनाकर रखनी होती है. समय के साथ या तो अपने आत्मबल के विरुद्ध तत्त्वों की दिशा मोड़कर हम अपनी तरफ कर लेते हैं या स्वयं को ही उसके अनुरूप ढाल लेते हैं.

इसलिए बोलने से ज्यादा सुनने पर बल दिया गया है. कम बोलें, सच बोलें, नाप-तौलकर बोलें. अाज किसी को किसी की जरूरत कम ही पड़ती है. अतः प्रयास करना चाहिए कि अल्प समय के लिए जब लोग आपस में मिलें, तो एक-दूसरे की भावनाओं को समझें और प्रेम-सौहार्द बनाये रखने में कोई कसर न छोड़ें.

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