सरकार ने ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज’ के जरिये लाल किले समेत देश की दस ऐतिहासिक धरोहरों को निजी कंपनियों के हाथों में सौपने का निर्णय लिया है.
इन इमारतों से इतिहास की कई घटनाएं जुड़ी हैं जिसे निजी हाथों में सौंपने से पहले जनमानस से राय जरूर लेनी चाहिए. अब निजी हाथों में जाने से पर्यटन स्थलों पर विज्ञापन जैसे कार्यो में देश सर्वोपरि न होकर उद्योगों के हित को प्राथमिकता मिलेगी.
सरकार ने 25 करोड़ का अनुबंध अगले पांच साल के लिए किया. ऐसे में क्या सरकार पांच करोड़ रुपये प्रतिवर्ष ईमानदारी से खर्च नहीं कर सकती है. सरकार ऐसी धरोहरों को निजी कंपनी के हाथों में सौंप देगी, तो संस्कृति मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं का औचित्य क्या रह जायेगा?
महेश कुमार, इमेल से
