तेल कीमतों में फिर वृद्धि

तेल की कीमतों में रोजमर्रा की बढ़ोतरी ने लगभग एक चलन का रूप ले लिया है और डीजल-पेट्रोल के दाम एक बार फिर बढ़े हैं, तो जैसे इस चलन ही की पुष्टि हुई है. रविवार के मुकाबले सोमवार को दोनों की कीमत में 10 से 11 पैसे का इजाफा हुआ है. रविवार को दिल्ली में […]

तेल की कीमतों में रोजमर्रा की बढ़ोतरी ने लगभग एक चलन का रूप ले लिया है और डीजल-पेट्रोल के दाम एक बार फिर बढ़े हैं, तो जैसे इस चलन ही की पुष्टि हुई है. रविवार के मुकाबले सोमवार को दोनों की कीमत में 10 से 11 पैसे का इजाफा हुआ है. रविवार को दिल्ली में पेट्रोल 74.40 रुपये प्रति लीटर था और डीजल 65.65 रुपये प्रति लीटर. कुछ राज्यों में कीमत इससे भी ज्यादा ऊंची है.
बीते पांच सालों में डीजल-पेट्रोल के दाम कभी इतने ऊंचे नहीं चढ़े. इस मामले में कुछ बातें साफ-साफ लक्ष्य की जा सकती हैं. एक तो यही कि जब से तेल की कीमतों में रोजाना के हिसाब से बदलाव का फैसला हुआ है, तब से बहुत कम मौके आये हैं, जब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा न हुआ हो. दूसरी बात यह कि दक्षिण एशिया के देशों में भारत में तेल की कीमत सबसे ज्यादा है.
तीसरे यह कि डीजल-पेट्रोल के दामों में बढ़ती से रोजमर्रा की चीजों के दामों की बढ़त का सीधा रिश्ता है. सो तेल की कीमतों के बढ़ने की खबर पर तेल कंपनियों और सरकार को बढ़ोतरी को जायज ठहराने के लिए कोई न कोई कारण बताना पड़ता है. फिलहाल लगातार पांच दिनों से बढ़ रहे दाम पर तेल कंपनियों का कहना है कि सीरिया में चल रही लड़ाई के कारण वैश्विक तेल के उत्पादन और वितरण के बाजार पर असर पड़ा है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की चढ़ती कीमत का तर्क अब उतना कारगर नहीं रहा, क्योंकि रोजमर्रा की घट-बढ़ के बावजूद तेल की कीमतें उतनी ऊंची नहीं जितनी कि एक दशक पहले हुआ करती थीं. कीमतों में बढ़ोतरी को जायज ठहराने के लिए दूसरा तर्क दिया जाता है कि राज्य सरकारें चाहें, तो डीजल-पेट्रोल के दाम एक हद तक नियंत्रित रह सकते हैं.
इसके लिए राज्य सरकारों को तेल की बिक्री से हासिल होनेवाले राजस्व में से अपना हिस्सा कम करना होगा. यही तर्क बीते दिनों केंद्रीय मंत्री (पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस) धर्मेंद्र प्रधान ने दिया था. उनकी दलील थी कि कीमतों की बढ़ती की शिकायत न करके सरकार के विकास कार्यों को देखा जाये. केंद्र और राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का एक आकर्षक जरिया डीजल-पेट्रोल है.
वर्ल्ड फैक्ट बुक (अमेरिकी संस्था सीआइए का प्रकाशन) के मुताबिक भारत में 37 लाख 35 हजार बैरल तेल की खपत रोजाना होती है और तेल की खपत के मामले में अमेरिका, चीन, जापान के बाद दुनिया में भारत चौथे नंबर का देश है. तेल की बिक्री पर उत्पाद शुल्क और वैट आदि के जरिये केंद्र और राज्य सरकारों की आकर्षक कमाई होती है.
एक आकलन है कि तेल पर उत्पाद शुल्क में वृद्धि के कारण केंद्र सरकार को 2 लाख 42 हजार करोड़ रुपये के राजस्व की आमद हुई, जबकि 2014-15 में यह आंकड़ा 99 हजार करोड़ का था. दरअसल डीजल-पेट्रोल की बिक्री से हासिल राजस्व के अपने हिस्से में न केंद्र सरकार कमी करना चाहती है, ना ही राज्य सरकारें. सो, केंद्र-राज्य सहयोग के आधार पर ही तेल की कीमतों में कमी की उम्मीद पाली जा सकती है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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