कहा जा रहा है कि 1159 गैरजरूरी कानूनों को खत्म कर जीने की राह आसान बना दी गयी है, मगर लोग जुमले और हकीकत में फर्क करना समझने लगे हैं. उन कानूनों का खत्म होना निहायत जरूरी था, जो तरक्की के रास्ते में रुकावटें पैदा करते थे, मगर चार साल बीत गये, न तो उनके दबे पाव जाने की खबर हुई, न ही जिंदगी आसान.
जिस सिस्टम से हम रोज रूबरू होते हैं, वह तो वहीं-का-वहीं खड़ा है! बैंकों के पैसे हों या औरतों की अस्मत, हिफाजत की गारंटी कहीं नहीं. न किसानों की खुदकुशी रुकी, न नौजवानों के रोजगार की तलाश. रेड कारपेट से दबे निचली पायदान को क्या खबर कि कितने आये और कितने आ कर चले गये!
एमके मिश्रा, रातू, रांची
