आतंकवाद एवं देशद्रोह के अनेकों ऐसे मामले सामने आ रहें हैं, जिनमें न्याय के नाम पर जम कर मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है. वह चाहे कश्मीर हो या कहीं भी बम ब्लास्ट हो या विद्रोही गतिविधियां. कितनी ही बार पुलिस निर्दोष लोगों को फंसा देती है. ऐसा सिर्फ इसलिए किया जाता है कि उसे सरकार को बताना पड़ता है कि उसने दोषी को पकड़ लिया है.
लेकिन उनमें से अधिकांश पांच-दस साल या 15 साल जेल में रहने के बाद अदालत से बरी हो जाते हैं. मोहम्मद आमिर खान एक ऐसा ही नाम है, जिसे 1998 के गिरफ्तार किया जाता है और 14 साल बाद निर्दोष घोषित किया गया. फिर मानवाधिकार आयोग के आदेश पर पांच लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा हुई.
उसे भी मिलने में पांच साल लग गये. क्या यही सत्यमेव जयते है? समर्पण करनेवाले आतंकी या उग्रवादी को ढेरों ऑफर दिये जाते हैं. फिर जो बिना गुनाह किये सजा काटते हैं, उनके लिए मुआवजे का प्रावधान क्यों नहीं किया जाता?
जंग बहादुर सिंह, इमेज से
