सत्ता में वापसी के बाद अपने पहले दौरे पर भारत पहुंचे नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली इस्लामाबाद में प्रस्तावित दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) सम्मेलन की वकालत करते नजर आये. लेकिन, सीमा पर जारी तनाव और आतंकवादपरस्त पाक नीतियों का हवाला देते हुए भारत ने बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया है.
दरअसल, नवंबर, 2016 में पाकिस्तान को 19वें सार्क सम्मेलन की मेजबानी करनी थी, लेकिन सम्मेलन से पहले पठानकोट और उड़ी में हुए आतंकी हमलों के बाद भारत ने विरोध में सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया था.
इसके बाद बांग्लादेश, भूटान, अफगानिस्तान भी भारत के समर्थन में खड़े हो गये थे. खुद को अलग-थलग पड़ता देख पाकिस्तान अब एक बार फिर से सम्मेलन के लिए आपसी सहमति बनाने पर जुट गया है. पाकिस्तान के स्थापना दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे श्रीलंकाई राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने भी सार्क सम्मेलन के आयोजन को जरूरी बताया था.
नेपाल और श्रीलंका ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान अन्य दक्षिण एशियाई देशों के साथ मिलकर सहमति बनाने के लिए प्रयासरत है. नेपाल में नयी सरकार के गठन के बाद पहले विदेशी मेहमान के रूप में पहुंचे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी ने सार्क सम्मेलन के लिए नेपाल का समर्थन मांगा था.
पाकिस्तान की इस अकुलाहट के पीछे दो बड़े कारण हैं- पहला, साल के अंत में पाकिस्तान में प्रस्तावित आम चुनाव और दूसरा, पाकिस्तान के बगैर दक्षिण एशियाई देशों का भारत के साथ बिम्सटेक के रूप में मजबूत होता विकल्प. चीन के साथ सामरिक और आर्थिक संबंधों के दबाव में पाकिस्तान को दक्षिण एशिया में प्रासंगिक बने रहने के लिए तमाम प्रयास करने हैं. लेकिन, सार्क के दूसरे सबसे बड़े सदस्य के रूप में रचनात्मक भूमिका निभाने के बजाय पाकिस्तान का अब तक का रवैया दुर्भाग्यपूर्ण रहा है.
वर्ष 2016 में सार्क सम्मेलन के बहिष्कार के बाद गोवा में ब्रिक्स सम्मेलन के सामानांतर बिम्सटेक देशों के नेताओं को आमंत्रित कर भारत ने सख्त संदेश देने की कोशिश की थी. लेकिन, जिस पाकिस्तान ने दुनिया की आंख में धूल झोंककर आतंकवाद को ही अपनी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बना लिया हो, उससे उम्मीद ही क्या की जा सकती है.
पाकिस्तान आतंकियों के पनाहगाह ही नहीं, बल्कि आतंकवाद की मानसिकता के बीजारोपण में जुटा है. वह अपने पालतू आतंकियों पर लगाम लगाये बिना क्षेत्र में शांति और सहयोग का प्रपंच करता है. दुनिया की 21 प्रतिशत आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में नौ प्रतिशत से अधिक का योगदान देनेवाले दक्षिण एशियाई देशों के संगठन का गठन ही क्षेत्रीय विकास के बड़े सपने के साथ हुआ था.
आज दक्षिण एशिया में ड्रग्स तस्करी रोकने, शिक्षा, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था जैसे तमाम मुद्दे हैं, लेकिन आतंकवाद को लगाम लगाकर जब तक शांति और सौहार्दपूर्ण माहौल तैयार नहीं किया जाता, आगे बढ़ने की कल्पना कैसे की जा सकती है.
