अंशुमाली रस्तोगी
व्यंग्यकार
जियो और जीने दो में मेरा विश्वास बचपन से है. अपनी तरफ से मेरी पूरी कोशिश रहती है- मैं न किसी को सताऊं, न मारूं, न दबाऊं. खुद भी सुकून की जिंदगी काटूं, दूसरे को भी काटने दूं. क्योंकि जीवन अनमोल है.
इसलिए मैंने मच्छरों को मारना, उड़ाना, भागना कतई बंद कर दिया है. कमरे में विकट मच्छर होने के बावजूद न मैं कॉइल जलाता हूं न रैकेट ही चलाता हूं.
उन्हें इत्मिनान से विचरण करने देता हूं. जहां जिधर भी बैठना चाहें, बैठे रहने देता हूं. अब तो कमरे से मैंने सीलिंग फैन भी उखड़वा दिया है. हालांकि, इस मुद्दे पर पत्नी से भीषण बहस कई दफा हो चुकी है, मगर मैं अपने इरादे पर कायम हूं. क्योंकि जैसे मेरा जीवन अनमोल है, वैसे ही मच्छरों का भी.
मच्छरों के प्रति हम बेहद नकारात्मक नजरिया रखते हैं. हर वक्त उनका विनाश करने का ही प्लान बनाते रहते हैं. अब तो सरकारें भी मच्छरों के अस्तित्व पर सख्त हो गयी हैं. विडंबना देखिए, सरकार मधुमक्खी पालन पर तो जोर देती है, किंतु मच्छर पालन पर गोल रहती है.
क्या यह मच्छर प्रजाति का अपमान नहीं है? जबकि मच्छर से कहीं ज्यादा नुकसान मधुमक्खी करती है. जिन्हें मधुमक्खी ने काटा हो, वे उस असहनीय पीड़ा को बेहतर समझ सकते हैं.
इंसान के आक्रामक व्यवहार को देखते हुए मच्छरों ने भी खुद को बदल लिया है. वे भी ढीठ हो चले हैं. इंसान कितनी ही जुगत कर ले उन्हें भगाने या मारने की, पर अब न वे भगाते हैं, न मरते हैं. आलम यह है कि उन पर किसी हानिकारक कॉइल, दवा, स्प्रे या फिर किसी रेपिलेंट का भी कोई असर नहीं होता. वे धड़ल्ले से हमें काट रहे होते हैं. और अपना पेट भर रहे होते हैं.
मैं देख रहा हूं, जिन मच्छरों से अपने आप को मैं प्रायः कटवाता रहता हूं, वे सेहत में बड़े बलशाली हैं. खूब मोटे और ताजा होते हैं. किसी भी खाये-पीये मच्छर को दीवार पर बैठे देखता हूं, तो मेरा दिल अंदर से खासा गर्व फील करता है कि मेरा खून किसी के तो काम आ रहा. इंसान को अपना खून पिलाने से कहीं बेहतर समझूंगा मच्छर को खून पिलाना. कम-से-कम वह मेरा एहसान तो मानेगा.
मैं सब कुछ सह सकता हूं, लेकिन मच्छरों के प्रति बेवफाई बर्दाश्त नहीं कर सकता. चाहे कोई हो. मैं मच्छरों को यों बेमौत मारे जाने के सख्त खिलाफ हूं. मच्छर की उम्र यों भी 10-12 दिन की ही तो होती है. क्यों नहीं उसे उतने दिन सुकून से जीने दिया जाये. हमें किसी की भी जान लेने का लीगल अधिकार नहीं है. नहीं तो हममें और जानवर में फर्क ही क्या रह जायेगा.
सोच रहा हूं, अपनी बची-खुची जिंदगी मच्छरों को बचाने, उनके हितों की रक्षा में खर्च कर दूं. इंसानों के साथ सहानुभूति जताने का फल मुझे उपेक्षा के रूप में ही मिला है. क्यों न अब मच्छरों के जीवन को ही बचाया जाए!
