संबंधों में संतुलन बना रहे

हाल में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आयी हैं, जिसके बाद से कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंधों और सीमाओं को लेकर देशभर में बहस चल पड़ी है. बहस की दिशा और दशा चाहे जो भी हो, घटनाओं का निहितार्थ लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए चिंता पैदा करने वाला है. न्यायपालिका और कार्यपालिका, दोनों के क्षेत्राधिकार […]

हाल में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आयी हैं, जिसके बाद से कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंधों और सीमाओं को लेकर देशभर में बहस चल पड़ी है. बहस की दिशा और दशा चाहे जो भी हो, घटनाओं का निहितार्थ लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए चिंता पैदा करने वाला है.
न्यायपालिका और कार्यपालिका, दोनों के क्षेत्राधिकार संविधान में स्पष्ट हैं. दोनों की भूमिका और दायित्व भी संविधान में भलीभांति निरुपित हैं. स्वतंत्र न्यायपालिका से इतर कोई परिस्थिति या प्रयोग राष्ट्रहित में नहीं है. न तो न्यायपालिका में कार्यपालिका का हस्तक्षेप उचित है, न ही न्यायपालिका की कार्यपालिका को लेकर अतिरिक्त सक्रियता.
दोनों के संबंधों में संतुलन ही हमारी संवैधानिक व्यवस्था की पूंजी है. इसलिए जरूरी है कि दोनों अपने-अपने कर्तव्यों और दायित्वों के प्रति जागरूक रहते हुए जनता की तकलीफों और जरूरतों पर ध्यान दें. इसी में देश, लोकतंत्र और जनता का हित निहित है.
युगल किशोर, इ-मेल से.

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