आये थे हरि भजन को !

आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास. कहां तो निकले थे घपलों का भंडाफोड़ करने और कहां शतरंज के घोड़ो के आगे प्यादे की मानिंद अचानक कदम रुक गये. फिर संतों को न तो नर्मदा की पीड़ा दिखी, न घपलो के निशान. मोक्ष की राह दिखाते-दिखाते धर्मगुरुओं को अपनी मुक्ति का मार्ग राजधर्म की […]

आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास. कहां तो निकले थे घपलों का भंडाफोड़ करने और कहां शतरंज के घोड़ो के आगे प्यादे की मानिंद अचानक कदम रुक गये. फिर संतों को न तो नर्मदा की पीड़ा दिखी, न घपलो के निशान. मोक्ष की राह दिखाते-दिखाते धर्मगुरुओं को अपनी मुक्ति का मार्ग राजधर्म की गलियों में ही दिखने लगा.

आखिर ‘परमारथ’ का ही नाम तो साधु है! सियासी खरीद-फरोख्ता का नायाब नमूना इस से बेहतर क्या हो सकता है? त्रिपुंडधारी बाबाओं को राज्य मंत्री का दर्जा क्या मिला, घोटालों के वृक्ष में हरियाली आ गयी.

नर्मदा आंदोलन महज पद और पदवी के लिए किया गया छल बन कर रह गया. शासन और संतों का गंठजोड़ नया नहीं, मगर साधुओं का इस तरह बदलता रंग देख सियासत भी हक्का-बक्का है. पढ़े लिखे युवा बेरोजगारों की लाइन में धक्के खाते रहे और वैरागियों ने दो कदम में ही सियासत की कुर्सी नाप ली!

एमके मिश्रा, रातू, रांची

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