छायावाद की शतवार्षिकी

II रविभूषण II वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com पिछले महीने (23-24 मार्च) विश्वभारती, शांतिनिकेतन के हिंदी विभाग ने छायावाद की शतवार्षिकी के उपलक्ष्य में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘छायावाद : संस्मृति एवं पुनर्मूल्यांकन’ शीर्षक विषय पर आयोजित कर छायावाद की शतवार्षिकी का शुभारंभ किया. छायावाद के सौ वर्ष पर देश में होनेवाला यह पहला आयोजन था, जिसके छह […]

II रविभूषण II

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

पिछले महीने (23-24 मार्च) विश्वभारती, शांतिनिकेतन के हिंदी विभाग ने छायावाद की शतवार्षिकी के उपलक्ष्य में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘छायावाद : संस्मृति एवं पुनर्मूल्यांकन’ शीर्षक विषय पर आयोजित कर छायावाद की शतवार्षिकी का शुभारंभ किया.

छायावाद के सौ वर्ष पर देश में होनेवाला यह पहला आयोजन था, जिसके छह सत्रों में छह-सात राज्यों के लगभग बीस अध्यापकों, आलोचकों, कवियों ने अपने विचारों से सौ वर्ष पहले के उस काव्यांदोलन का स्मरण कर उसके कई अनछुए पक्षों की भी चर्चा की.

क्या आधुनिक भारत के किसी भी इतिहासकार ने 1929-30 के पहले 1918 से नयी गति-शक्ति प्राप्त करते हुए राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन पर सार्थक ढंग से विचार किया है?

रामचंद्र शुक्ल के बहुत बाद आधुनिक भारत के इतिहासकारों ने 1918 से राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की ‘तीसरी उत्ताल तरंग’ माना है. इन इतिहासकारों से वर्षों पहले रामचंद्र शुक्ल ने आधुनिक हिंदी कविता का ‘तृतीय उत्थान’ 1918 से माना था- ‘तृतीय उत्थान में आकर खड़ी बोली के भीतर काव्य का अच्छा स्फुरण हुआ…

जिस देश-प्रेम को लेकर काव्य की नूतन धारा भारतेंदु काल में चली थी, वह उत्तरोत्तर प्रबल और व्यापक रूप धारण करता गया… तृतीय उत्थान में आकर परिस्थिति बहुत बदल गयी. आंदोलनों ने सक्रिय रूप धारण किया और गांव-गांव में राजनीतिक और आर्थिक परतंत्रता के विरोध की भावना जगायी गयी.’ सन् 1918 से 1936 तक का समय साहित्य और राजनीति दाेनों ही दृष्टियों से अधिक महत्वपूर्ण है. यह छायावाद का समय है और इसी दौर में गांधी, नेहरू, सुभाष, पटेल, आंबेडकर ने स्वाधीनता-आंदोलन को एक नयी गति और ऊष्मा दी. कथा-साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद और हिंदी आलोचना रामचंद्र शुक्ल इसी समय शीर्ष पर पहुंचे. प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी- सबकी कविताएं इसी समय कालजयी बनीं.

अभी तक इस दौर का गंभीर विवेचन-मूल्यांकन आंदोलनों, राजनीतिक सक्रियताओं, स्वाधीनता-आंदोलन, कला, साहित्य, संस्कृति, आलोचना का पत्रिकादि के प्रकाशन-संपादन आदि अनेक दृष्टियों से एक साथ समग्र रूप से नहीं हुआ है. क्या छायावाद की शतवार्षिकी के अवसर पर इसकी शुरुआत हो सकेगी?

पंत ने ‘पल्लव’ के प्रवेश में, जिसे ‘छायावाद का घोषणापत्र’ कहा जाता है, कविता के एक नये व्याकरण के निर्मित होने की बात कही थी. केवल कविता ही नहीं, उस समय समाज और राजनीति- सबका व्याकरण बदल रहा था.

कांग्रेस प्रस्ताव भंजना छोड़कर संघर्ष में उतर चुकी थी. असहयोग आंदोलन से लेकर लाहौर कांग्रेस और पूर्ण स्वाधीनता की घोषणा और मांग का यही समय है. हिंदी कविता में ‘ब्रजभाषा और खड़ी बोली के बीच जीवन-संग्राम का युग बीत गया’ था. हिंदी ने ‘तुतलाना छोड़ दिया’ था.

पंत ने लिखा- ‘वह पिय को प्रिय कहने लगी है.’ साल 1918 ‘सेवा सदन’ और ‘झरना’ का प्रकाशन वर्ष है. पंत की ‘वीणा’ का प्रकाशन भले 1927 में हुआ हो, पर उसकी 63 कविताओं में से 46 कविताएं 1918 की हैं. इन कविताओं में बार-बार ‘मां’ का उल्लेख है. ‘नव’ की चाह है और है प्रकृति-प्रेम. साल 1918 से 1936 के बीच के स्वाधीनता आंदोलन में एक साथ कई धाराएं और प्रवृत्तियां विद्यमान थीं. स्वाधीनता आंदोलन राजनीतिक आंदोलन था, पर वह सांस्कृतिक सामाजिक आंदोलन भी था. केवल अंग्रेजों को खदेड़ना भर नहीं था.

छायावाद सांस्कृतिक आंदोलन है. छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन हो चुका है. अब आवश्यकता उसके सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन की है, जिससे राष्ट्रीय स्वाधीनता-आंदोलन में उसकी भूमिका रेखांकित की जा सके. छायावाद की नवता केवल साहित्यिक नवता नहीं है.

नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘छायावाद’ में इसे ‘राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति’ मानकर स्पष्ट शब्दों में यह लिखा था कि यह ‘एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से.’ आज हम 2018 में क्या सचमुच पुरानी रूढ़ियों और विदेशी पराधीनता (आर्थिक, सांस्कृतिक) से मुक्त हो चुके हैं? इन कवियों की आकांक्षा धरती और आकाश को एक कर देने की थी- ‘एक कर दे धरती आकाश.’

किसानों की दीनदशा की ओर निराला का ध्यान 1923 में ही गया था. ‘विप्लव के बादल’ में उन्होंने लिखा- ‘जीर्ण बाहु है, शीर्ण शरी/ तुझे बुलाता कृषक अधीर/ ऐ विप्लव के वीर!’ महाराष्ट्र में पिछले दिनों किसानों ने जो मार्च किया, उसमें क्या हम उस महिला के छाले पड़े पांवों को कभी भूल सकेंगे? यह ‘छाला’ आजादी पर लोकतंत्र पर, संविधान- सब पर पड़ता गया है.

छायावाद के बीज शब्दों में से ‘नव’ और ‘स्वतंत्रता’ विशेष महत्वपूर्ण हैं. जिसे ‘विकास’ का ढोल पीटा जा रहा है, उसे प्रसाद की ‘कामायनी’ में श्रद्धा द्वारा मन को कहे गये इस पंक्ति से जोड़कर देखें- ‘अपने में सब कुछ भर कैसे, व्यक्ति विकास करेगा?’ विकास-संबंधी प्रसाद और मनमोहन-माेदी की अवधारणा में क्या कोई साम्य है?

छायावाद मुक्ति-काव्य, जागरण-काव्य, ज्योति-काव्य और शक्ति-काव्य है. आज जब राजनीति हमें अंधकार में धकेल रही है, हमें निराला और प्रेमचंद का सदैव स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने ‘जागो फिर एक बार’ कहा था और लिखा था- ‘अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है.’ 2018 का भारत हमें छायावाद (1918-1936) का स्मरण करने को बाध्य करता है. स्त्री, दलित, पर्यावरण, विकास, वास्तविक स्वतंत्रता आदि कई दृष्टियों से आज छायावाद का अध्ययन आवश्यक है.

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