गतिरोध की संसद

लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता इसलिए स्वीकार की गयी है कि वहां देश के अहम मुद्दों पर विमर्श होगा, पर हाल में समाप्त हुए संसद के बजट सत्र को इसलिए याद किया जायेगा कि हमारे सांसदों ने काम से ज्यादा हंगामा किया. 21वीं शताब्दी के इन अठारह वर्षों में पहला मौका है जब संसद की […]

लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता इसलिए स्वीकार की गयी है कि वहां देश के अहम मुद्दों पर विमर्श होगा, पर हाल में समाप्त हुए संसद के बजट सत्र को इसलिए याद किया जायेगा कि हमारे सांसदों ने काम से ज्यादा हंगामा किया. 21वीं शताब्दी के इन अठारह वर्षों में पहला मौका है जब संसद की कार्यवाही इतनी कम चली और 23 फीसदी ही कामकाज हो पाया.

70 साल में पहली बार आम बजट और वित्त विधेयक जैसे मामले बगैर किसी बहस-मुबाहिसे के पास हो गये. देश से जुड़े बहुत सारे ऐसे मसले थे, जिन पर संसद में ही बात होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा लगता है कि देश चलाने वाले लोग अपनी असहमतियों का निबटारा संसद के बदले सड़क पर करना चाहते हैं. संसद में इस गतिरोध के लिए भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है, तो कांग्रेस ने भी पलटवार किया है.

अब दोनों बड़ी पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ सड़क पर उतरने वाली हैं. यह स्थिति बेहद दुखद है. सड़क के मसलों पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी. संसद की प्रासंगिकता भी इसी बात पर निर्भर करती है कि वह अपने कामकाज के दायरे में लोगों की समस्याओं, ज्वलंत मुद्दों, देश से जुड़े गंभीर सवालों को किस हद तक ला पाती है. इस कसौटी पर देखें, तो ऐसा लगता है कि संसद अपनी भूमिका से क्रमश: फिसलती जा रही है.

लोकतंत्र में असहमति को उसकी जीवंतता का प्रतीक भी माना जाता है. पक्ष और विपक्ष, दोनों की भूमिकाएं तय हैं. इतिहास में कई ऐसे मौके आये, जब विपक्ष ने संसद को चलने नहीं दिया, लेकिन सरकारी पक्ष ने संसद को चलाने के लिए पहल की, कोई बीच का रास्ता निकाला.

दोनों पक्षों के बीच सहमति बनी और संसद की कार्यवाही चलने लगी. इसके अनेक उदाहरण हैं, लेकिन दुर्भाग्य से बीते बजट सत्र के गतिरोध को दूर करने की कोशिश किसी भी ओर से नहीं हुई. न तो विपक्ष ने अपने संसदीय दायित्वों और प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए नर्म रुख अपनाया, न ही सत्तापक्ष के इसके लिए कोई प्रभावी पहल की.

ऐसे में जरूरी ग्यारह विधेयक लटक गये. संसद के 120 घंटे बर्बाद हो गये. उस पर खर्च होनेवाला पैसा देश के आम आदमी का है, मगर अर्थव्यवस्था, रोजगार, बैंकिंग घोटालों, अलग-अलग हिस्सों में फैले जातीय तनाव-उन्माद, चीन की ओर से हमारी सीमा में घुसपैठ, कश्मीर की चिंताजनक हालत जैसे मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हुई.

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून को लेकर भारत बंद हुआ. सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाये गये, पर किसी भी सवाल पर संवाद नहीं हो सका. ऐसे में कामकाजी और जनता के प्रति उत्तरदायी संस्था के बदले संसद एक प्रतीकात्मक संस्था बनकर रह जाये, तो मान लेना चाहिए कि जनता का यह तंत्र बीमारी से जूझ रहा है.

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