दो अप्रैल के एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के विरुद्ध भारत बंद के दौरान हुई हिंसा दुर्भाग्यपूर्ण है. इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि देश में शांति व्यवस्था कायम रखे?
एक्ट में संशोधन का फैसला 20 मार्च को आया था. सरकार के पास पर्याप्त समय था इसके खिलाफ कोर्ट जाने का, लेकिन सरकार ने बहुत देर कर दी फैसला लेने में कि क्या किया जाये.
जब चुनाव आता है, तो राजनीतिक दल स्वयं ही जातिगत राजनीति को बढ़ावा देते हैं. सारे सामाजिक समीकरण बैठाये जाते हैं. कई बार इसके लिए एक्सपर्ट तक की मदद ली जाती है. ऐसे में लोगों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे जातीय चेतना से ऊपर उठें.
पहले ही देश के विभिन्न राज्यों में दलितों व आदिवासियों के खिलाफ शोषण की कई घटनाएं देखने-सुनने को मिल रही थी. इस फैसले ने आग में घी डालने का काम किया. हिंसा होना निंदनीय है, लेकिन ऐसे मौकों का फायदा असामाजिक तत्व उठाते ही हैं. उनके खिलाफ सरकार को समुचित कार्रवाई करनी चाहिए.
संदीप सोरेन, इमेल से
