पिछले कुछ वर्षों से न्यायपालिका के भीतर की असहमतियां तथा कार्यपालिका से उसकी तनातनी लगातार खबरों में हैं. न्यायाधीशों की कमी, नियुक्ति पर तकरार, संसाधनों का अभाव, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीशों में तालमेल का न होना आदि अनेक मसलों पर अक्सर विवाद खड़े होते रहते हैं.
एक स्वस्थ संवैधानिक लोकतंत्र में मतों की विविधता और विरोधाभासी विचारों का होना जरूरी है, परंतु अगर न्यायपालिका और कार्यपालिका में बार-बार टकराव हो तथा इस टकराव का एक असर यह हो कि न्यायाधीशों में ही बुनियादी एका टूटने लगे, तो यह मान लेना चाहिए कि शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं में सबकुछ सामान्य नहीं है.
इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश जे चेलामेश्वर की हालिया चिंता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. उन्होंने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को संबोधित अपने पत्र में कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है.
मौजूदा कायदों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम नियुक्त किये जानेवाले न्यायाधीशों के नाम सरकार को संस्तुति के लिए भेजती है. न्यायाधीश चेलामेश्वर ने लिखा है कि सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों को शायद ही कभी मानती है.
यह ध्यान देने की बात है कि उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए करीब 230 नामों के प्रस्ताव डेढ़ साल से सरकार के पास लंबित हैं. सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी दो नामों पर सरकार का रवैया नकारात्मक रहा है. सर्वोच्च न्यायालय में 31 की जगह 27 न्यायाधीश ही कार्यरत हैं.
इस वर्ष प्रधान न्यायाधीश समेत छह न्यायाधीश सेवानिवृत्त होंगे. यह भी याद रखा जाना चाहिए कि न्यायपालिका की विभिन्न समस्याओं के कारण लाखों मुकदमे लटके पड़े हैं. सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम और प्रधान न्यायाधीश द्वारा न्यायाधीशों को मुकदमे देने के मसले पर पहले भी काफी बहस हो चुकी है.
सवाल यह नहीं है कि इन टकरावों के लिए कौन जिम्मेदार है या किसे दोष दिया जाये, मसला यह है कि अगर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश आपस में या फिर सर्वोच्च न्यायालय और सरकार आपस में समस्याओं का निबटारा नहीं कर सकते हैं, तो यह देश की समूची शासन व्यवस्था के लिए चिंताजनक स्थिति है.
विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकारों का स्पष्ट बंटवारा संविधान एवं अन्य व्यवस्थाओं के तहत किया गया है. अगर कोई विवाद पैदा भी होता है, तो शीर्ष संस्थाओं से यह उम्मीद तो रहनी चाहिए कि वे इसका निबटारा समुचित तरीके से कर लेंगे. दुर्भाग्य की बात है कि संबंधित मसलों पर सरकार का रुख स्पष्ट नहीं है.
कार्यपालिका और विधायिका में राजनीति के सकारात्मक और नकारात्मक रुझानों का दखल स्वाभाविक है, पर इस खींचतान से न्यायपालिका के स्वतंत्र और स्वायत्त स्वरूप को बचाना लोकतांत्रिक प्रणाली और उसके मूल्यों को बचाना है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी संबद्ध पक्ष अपने उत्तरदायित्व को ठीक से समझते हुए सही रवैये से खामियों को दूर करने की कोशिश करेंगे.
