मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रक्रिया व कार्य संचालन के नियमों में किया गया संशोधन संविधान की मूल भावना के विरुद्ध व लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलने वाला है.
इसके तहत विचाराधीन मुद्दों पर कोई भी विधायक जन समस्याओं से जुड़े प्रश्न नहीं उठा सकता तथा सांप्रदायिक व संवेदन घटनाओं पर भी कोई सवाल-जवाब नहीं कर सकता.
इस तरह के काले कानून बनाकर सरकार जनता की जवाबदेही से बच नहीं सकती है. ऐसे कानून पहले भी महाराष्ट्र व राजस्थान में बनाये जा चुके हैं, जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले मीडिया, विधायक व जनता के विरोध के चलते वापस ले लिया गया. सरकारों को ऐसे कानूनों का परिणाम भी उपचुनावो में भुगतना पड़ा है.
बहुमत की सरकार बनने का मतलब यह तो नहीं कि लोकतंत्र का गला घोंटते हुए जनता के मौलिक अधिकारों पर हमले किये जाएं? ऐसी सरकारें सत्ता के घमंड में अधिनायकवादी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है. सरकार यदि संविधान व लोकतांत्रिक व्यवस्था में थोड़ा बहुत ही विश्वास करती है, तो इस जनविरोधी काले कानून को खत्म करे.
हरेंद्र सिंह कीलका, इमेल से.
