कविता विकास
लेखिका
मार्च का महीना, यानी परीक्षाओं का महीना. बोर्ड एक्जाम, होम एक्जाम. प्रतियोगी परीक्षा, सेमेस्टर परीक्षा. कुल मिलाकर विद्यार्थियों से ज्यादा माता-पिता और अभिभावकों की चिंता का समय. नंबर के खेल में उलझे बच्चे और परिवार. क्या ही अच्छा होता, अंकों का यह खेल कागज-कलम तक ही सीमित रहता. उससे किसी की पद-प्रतिष्ठा का कोई वास्ता नहीं होता. पैरेंट्स को जानना चाहिए कि बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं और उनकी क्षमता भी अलग-अलग होती है. जरूरी नहीं कि हर बच्चा गणित या विज्ञान में रुचि रखे. बच्चे अगर किसी आर्ट की ओर रुझान रखते हैं, तो वह भी कोई छोटी बात नहीं है.
कोई गाना गा सकता है, तो कोई खेल का शौक रख सकता है. एक ही परिवार में ही अलग-अलग हुनर वाले बच्चे होते हैं. साथ ही उनकी मानसिक क्षमता भी अलग-अलग होती हैं. दूसरे कामयाब बच्चों का हर समय उदाहरण देना भी उचित नहीं है, क्योंकि कामयाबी किसी एक क्षेत्र की मोहताज नहीं है. इससे बच्चों में जल्द ही हीन भावना आ जाती है.
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, कैरियर के लिए विषय चुनते समय और पढ़ाई के लिए प्रेरित करते समय यह ध्यान रहे कि वह विषय बच्चों की पसंद का हो. जिस क्षेत्र में उसकी रुचि है, उसी क्षेत्र में कैरियर का विकल्प तलाशें.
साथ ही बच्चों में सहनशीलता बढ़ाने और एकाग्रता बढ़ाने पर बल दिया जाये. उस पर भी अगर परिणाम संतोषजनक न हों तो निराश न हों, यहीं पर अभिभावक की जरूरत होती है. उन्हें बताएं कि कम अंकों के भी रास्ते हैं. विकल्प खोज लिया जायेगा. यह जिंदगी की आखिरी परीक्षा नहीं है. जिंदगी से प्यार करना सिखलाएं.
जीवन-समर में केवल पढ़ाई ही काम नहीं आती, व्यवहारकुशलता और नैतिकता भी जरूरी है. असफलता का दौर जीवन के प्रति उपेक्षा का भाव ला सकता है, जो भयंकर परिणाम की ओर ले जा सकता है.
कोशिश करें कि बच्चा कम ही जाने, लेकिन संतोष करना सीखे, जिससे कि उसके जीवन में आनंद रहे. उनके सामने रोष प्रकट करना या उनकी अवहेलना करना उन्हें नकारात्मकता के संसार में ले जा सकता है.
उनके साथ संवाद बनाये रखें. बच्चे की दिनचर्या में अचानक कोई परिवर्तन न करें, मसलन खेल का समय बंद करवा देना, दोस्तों से मिलने पर पाबंदी, देर रात्रि पढ़ने की अवधि बढ़ा देना आदि. ये परिवर्तन उनमें तनाव ला सकता है. इस समय उनके साथ दोस्ताना रवैया अपनाते हुए उन्हें विश्वास दिलाएं कि आप उनके अच्छे-बुरे दोनों वक्त में उनके साथ हैं.
उन्हें अपने सामर्थ्य के अनुसार आगे बढ़ना है, न कि समाज या परिवार के दबाव में. सत्रह-अट्ठारह साल का बच्चा अगर परीक्षा की वजह से टेंशन में हो, तो उसे बताएं कि विशाल चुनौतियों से भरी इस दुनिया में यह टेंशन तो शून्यप्राय है. औसत नंबर लानेवाले बच्चे अक्सर अपनी मासूम निगाहों से मानो विनती करते दिखते हैं कि उन्हें अंकों के आधार पर न आंको. यह जीवन की परीक्षा नहीं है.
