अस्पतालों-क्लिनिकों में अन्याय

हम डॉक्टर को भगवान का दर्जा देते हैं, क्योंकि जब हमारा कोई अपना बीमार होता है या हॉस्पिटल में होता है, तो हमारी एकमात्र उम्मीद डॉक्टर से ही होती है. अगर डॉक्टर ही साथ न दें, तो कैसा लगेगा? एक तो आपको इस बात की चिंता खाये जाती है कि मरीज ठीक कब होगा और […]

हम डॉक्टर को भगवान का दर्जा देते हैं, क्योंकि जब हमारा कोई अपना बीमार होता है या हॉस्पिटल में होता है, तो हमारी एकमात्र उम्मीद डॉक्टर से ही होती है. अगर डॉक्टर ही साथ न दें, तो कैसा लगेगा?

एक तो आपको इस बात की चिंता खाये जाती है कि मरीज ठीक कब होगा और उधर डॉक्टर इस सोच में रहते हैं कि पैसे की उगाही कैसे ज्यादा-से-ज्यादा की जा सकती है? जिनके पास पैसा है, उनका तो ठीक है, पर जिनके पास पैसा नहीं है, वे तो अपना सब कुछ बेच कर आते हैं.

आखिर देश में ऐसा कौन-सा कार्यालय है, जहां से मालूम हो सके कि कौन-सी दवा या सर्विस का कितना चार्ज हैं? क्या सरकार का काम सिर्फ टैक्स लेना है या इन सब बातों के मूल्यांकन का जिम्मा भी सरकार लेगी? अगर कोई आवाज नहीं उठाती है, तो दिन प्रतिदिन हॉस्पिटल या क्लिनिक या मेडिकल में मनमाने तरीके से पैसा लिया जाता रहेगा और जनता लुटती रहेगी.
पालुराम हेंब्रम, इमेल से

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