शिक्षा में ''गाउन-हुड'' और साफे!

हाल ही में झारखंड के कोल्हान विश्वविद्यालय ने गुलामी की निशानी ‘गाउन’ को उतार फेंका और डिग्रीधारकों को साफे में एक नयी पहचान देने की कोशिश की. शिक्षा के क्षेत्र में यह एक नायाब प्रयास है, जो सराहनीय है. मगर आश्चर्य नहीं कि यह प्रयास आगे चल कर एक बड़ा आंदोलन या सियासी मोहरा बन […]

हाल ही में झारखंड के कोल्हान विश्वविद्यालय ने गुलामी की निशानी ‘गाउन’ को उतार फेंका और डिग्रीधारकों को साफे में एक नयी पहचान देने की कोशिश की. शिक्षा के क्षेत्र में यह एक नायाब प्रयास है, जो सराहनीय है.
मगर आश्चर्य नहीं कि यह प्रयास आगे चल कर एक बड़ा आंदोलन या सियासी मोहरा बन जाये. शिक्षा में ‘गाउन-हुड’ और साफे की लंबी यात्रा में अभी भी गुलामी की गहरी छाप बरकरार है. देश की कई बड़ी छोटी डिग्रियां अब भी अपने भारतीय होने का प्रमाण मांग रही हैं.
महत्वपूर्ण यह नहीं कि डिग्रियां ‘गाउन’ में दी गयी या साफे में, महत्वपूर्ण तो यह है कि ऐसे विद्वान क्या 80 प्रतिशत शिक्षकविहीन विद्यालयों की देन हैं या अतिथि विद्वानों की. जिस देश के विद्यालयों में शिक्षकों की इतनी बड़ी संख्या रिक्त हो, महज साफा बदलना काफी नहीं है बल्कि शिक्षा की मूलभूत जरूरतों को बदलना होगा.
एमके मिश्रा, रांची

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