मरने वाला गरीब मर गया. तकलीफ में अब लीडरों और डीलरों की लड़ाई और एक मसालेदार राजनीतिक स्थिति. कोई कहता है मौत की वजह भूख है, तो कोई कहता है बीमारी. मगर यह जरूरी नहीं कि मरनेवाला मौत के दिन भूखा था या नहीं. क्या उसकी बीमारी की वजह भूख नहीं हो सकती?
बड़े लोग जब खाने को बैठते हैं, तो तश्तरी में अनेक जायके के भोजन पड़े होते हैं, जितना चाहे खा लो, बाकी कूड़ेदान के हवाले. मगर एक गरीब शाम का पकाया चावल सुबह बासी के रूप में खाता है. इस राजनीति से उन गरीब परिजनों का दर्द वापस नहीं बदल सकते. बस उन मोहताजों का ख्याल रखें. उनके दामन में चला गया एक अधिक रोटी, उन्हें विजय माल्या नहीं बना देगा़
शादाब इब्राहिमी, रांची, इमेल से
