जूतोत्सव की तरफ

आलोक पुराणिक व्यंग्यकार ऊपर जानेवाले उपग्रहों का स्तर बेहतर होता जा रहा है, पर नीचे के हालात के बारे में यह नहीं कहा जा सकता. बीस साल पहले भी उपग्रह बाढ़ से बदहाली की फोटो भेजता था और अब भी वही फोटो भेज रहा है. इंतजाम पहले भी नाकाफी थे, अब भी नाकाफी हैं, यह […]

By Prabhat Khabar Print Desk | September 11, 2017 6:41 AM

आलोक पुराणिक

व्यंग्यकार

ऊपर जानेवाले उपग्रहों का स्तर बेहतर होता जा रहा है, पर नीचे के हालात के बारे में यह नहीं कहा जा सकता. बीस साल पहले भी उपग्रह बाढ़ से बदहाली की फोटो भेजता था और अब भी वही फोटो भेज रहा है. इंतजाम पहले भी नाकाफी थे, अब भी नाकाफी हैं, यह जानने के लिए उपग्रह के फोटो की जरूरत नहीं. राष्ट्रीय एकता है, बिहार से लेकर मुंबई तक हाल एक से हैं.

मुंबई में कुछ घंटों की बारिश में नालियां उफन जाती हैं और अरबों का बजट रखनेवाला मुंबई नगर निगम एकदम निकम्मावस्था में रहता है पूरे साल. जहां नेताओं की चिंता सिर्फ यह होती है कि कौन तेरा मेयर कौन मेरा मेयर, वहां मुंबईवासी अपनी डूबे शहर में मरते-डूबते कह रहे होते हैं- मुंबई स्पिरिट है यह. डूबते मुंबईकर एक-दूसरे का हाथ पकड़ डूबते हुए कह रहे थे- मुंबई स्पीरिट का सेलिब्रेशन है यह. यमराज को ओवरटाइम करना पड़ रहा है कि गोरखपुर में बच्चों को पकड़ूं या मुंबई को संभालूं. मुल्क के नेताओं ने यमराज के लिए इतना काम छोड़ रखा है कि संभाले ना संभल रहा है.

दार्शनिक है यह मुल्क-हर चीज का सेलिब्रेशन कर लेता है. हर चीज का महोत्सव मना लेता है. गोरखपुर में मरते बच्चे क्या हैं- दर्शन महोत्सव है वह. गोरखपुर में यह दर्शन समझ में आ जाता है- न सरकार बचा सकती, ना डाॅक्टर बचा सकते, ना ऊपरवाला बचा सकता है, गोरखपुर में दर्शन महोत्सव चल रहा है.

मुंबई में भाईचारा महोत्सव है- लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं.जोधपुर में आॅपरेशन थियेटर में डाॅक्टर आॅपरेशन करने के बजाय आपस में लड़ रहे थे- मरीज खत्म. इसे भी युद्ध महोत्सव का नाम दिया जा सकता है. राजस्थान वीरों की धरती है, जर्रे-जर्रे में कटने-मरने की भावना है. डाॅक्टर भी आॅपरेशन थियेटर में पहले एक-दूसरे को मारने-काटने में टाइम लगाते हैं, मरीज का नंबर बाद में आता है. युद्धातुर महोत्सव- ऐसा सा कुछ नाम रखके ऐसी डाॅक्टरी मार-धाड़ को राजस्थान सरकार पर्यटन आकर्षण के तौर पर भी पेश कर सकती है

अभी दिल्ली में डेंगू से मौतों की खबर आनी शुरू हो गयी है- इसे मच्छर महोत्सव कह सकते हैं. सिर्फ डाॅक्टर और बाढ़ ही क्यों मारें, मच्छरों का भी हक बनता है मारने का. डेंगू महोत्सव हर साल अगस्त-सितंबर में आता है दिल्ली में. बिहार में प्रलय महोत्सव चल ही रहा है. महोत्सव प्रधान मुल्क करि राखा. सामने नाली के ऊपर खोमचे पर जलेबियां तली जा रही हैं, मच्छर-मक्खियां उनके ऊपर भिनभिना रही हैं- जलेबियों और नालीनिवासी मच्छरों का समन्वय महोत्सव.

पता नहीं वह दिन कब आयेगा, जब पब्लिक जूते लेकर निकम्मे नेताओं-अफसरों पर दौड़ेगी- जूतोत्सव से पहले उद्धार मुश्किल है.

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