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vishesh aalekh

  • Oct 7 2019 1:34AM
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सगुण तुलसी के भी राम हैं, निर्गुण कबीर के भी राम

सगुण तुलसी के भी राम हैं, निर्गुण कबीर के भी राम

 प्रशांत त्रिवेदी : राम भारतीय मन में नायकत्व की चरम परिकल्पना हैं, सारी कलाओं का उद्गम स्थल भी रामकथा है. रामलीलाएं संस्कृति की जीवंत परंपरा हैं. भारत का कोई स्मृति बोध लीला बोध से मुक्त नहीं हो सकता. सगुण तुलसी के भी राम हैं, निर्गुण कबीर के भी राम. हर भाषा समुदाय के अपने-अपने राम हैं. 

 
जैन धर्म में भी राम, बौद्ध धर्म में भी राम. उत्तर-पूर्व में कार्बी आबलोंग जनजाति की अपनी खाबिन अलोन रामायण, खामती लोगों की अपनी खामती रामायण है, ये मौखिक रूप से कब से चल रही है, किसी को नहीं मालूम. मालाबार मुसलमानों की भी अपनी रामायण है. पूरी दुनिया में भारतीय लोगों ने जहां भी प्रवास किया, मन में रामकथा के साथ गये.
 
थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रंथ है ‘रामायण’
थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रंथ ‘रामायण’ है, जिसे थाई भाषा में ‘रामिकिन्ने’ कहते हैं. इसका अर्थ राम-कीर्ति होता है. थाईलैंड में राजा अपने को राम की उपाधि धारण करता, राम चतुर्थ ने स्वम पद्य में पूरी रामायण को पुनः लिखा. स्थानीयता के आधार पर अनेक छोटी- छोटी कहानियों का समावेश किया गया, जो थाई रामायण को छोड़ कर अन्य कहीं अप्राप्य है. थाईलैंड में एक पूरी नृत्य व नाट्य परंपरा इसी रामकिन्ने पर आधारित है, जिसे खौन नृत्य कहते हैं.
 
प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’
विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया ने अपनी प्राचीन परंपराओं को इस्लाम के साथ आत्मसात किया. वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में वर्णन है कि सुग्रीव ने सीता की खोज में दूतों को यवद्वीप और सुवर्णद्वीप भी भेजा था. इतिहासकारों के मुताबिक यही आज के जावा और सुमात्रा हैं. राम कथा पर आधारित जावा की प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’ है, काकावीन अर्थात महाकाव्य, जो जावा की प्राचीनतम भाषा कावी में लिखी गयी.
 
पेराक प्रदेश में राम से संबंधित 1001 मूर्तियां
मलयेशिया का इस्लामीकरण 13वीं शताब्दी के आस-पास हुआ, इसके बाद भी लोग रामायण का परित्याग नही कर सके. एक अज्ञात लेखक की रामकथा पर आधारित एक विस्तृत रचना है- ‘हिकायत सेरीराम’, जो 13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच रचित हुई होगी. इस्लामिक प्रभाव होने के कारण यहां रामायण धार्मिकता नहीं, अपितु अपने सामाजिक शिक्षा के लिए प्रासंगिक बनी हुई है, लेकिन वे रामायण की तरह बुराई पर अच्छाई की जीत के आदर्श पर एकमत है.
 
कंबोडिया में रामलीला का अभिनय
कंबोडिया में रामलीला का अभिनय ल्खोनखोल के माध्यम के होता है. ‘ल्खोनखोल’ वस्तुत: एक प्रकार का नृत्य नाटक है, जिसमें कलाकार विभिन्न प्रकार के मुखौटे लगाकर अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं. इसके अभिनय में मुख्य रूप से ग्राम्य परिवेश के लोगों की भागीदारी होती है. कंबोडिया के राजभवन में रामायण के प्रमुख प्रसंगों का अभिनय होता है. पूरे दक्षिण पूर्व की रामायणों में रावण के चरित्र को बहुत अच्छे तरीके से दर्शाया गया है.
 
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