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vishesh aalekh

  • Jun 25 2019 9:35AM
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आपातकाल का वो काला दिन : जेल गये, लाठी खायी लेकिन हार नहीं मानी

आपातकाल का वो काला दिन : जेल गये, लाठी खायी लेकिन हार नहीं मानी
1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद इलाहाबाद हाइकोर्ट में समाजवादी नेता राज नारायण ने एक केस दाखिल किया था, जिस पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने इंदिरा के चुनाव को अवैध करार दे दिया था. 
 
24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को बरकरार रखा, लेकिन इंदिरा को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दे दी. उसके एक दिन बाद जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वान किया. जिससे देश भर में हड़ताल शुरू हो गयीं और जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत कई नेताओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था. नतीजा यह हुआ कि इंदिरा गांधी ने 25 जून की रात में देश में आपातकाल लागू करने का फैसला लिया. 
 
जयप्रकाश नारायण ने इसे 'भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि' कहा था. उस दौरान देश भर में जेपी आंदोलन में शामिल रहे लोगों को कैद कर लिया गया था. जेपी आंदोलन में शामिल कई लोग आज राजनीति में बड़े कद वाले हो चुके हैं. लेकिन हम आज कुछ ऐसी शख्सियतों से रूबरू करा रहा हैं जिन्होंने आंदोलन को सफल बनाने के लिए लाठियां खायी, जेल गये पर पर्दे के पीछे रहे. पेश है एक रिपोर्ट..
 
मां-बहनों के साथ के बिना यह संघर्ष असंभव था : रानी डे
 
घर की दहलीज लांघ जेपी आंदोलन का प्रतिनिधित्व करनेवाली रानी डे आज भले ही 80 वर्ष की हो चुकी हैं, पर आंदोलन की चिंगारी आज भी उनकी आखों में देखी जा सकती है. 
 
वह कहती हैं कि आंदोलन के समय हजारीबाग का उनका घर नेताओं का राजनीतिक अखाड़ा बन जाता था. आंदोलन को याद करते हुए कहती हैं कि जितना योगदान उस समय छात्र-नौजवानों का था, उतना ही मां-बहनों का भी था. उनके सहयोग के बिना यह संघर्ष संभव नहीं था. 1974 में मैं, मेरे पति बैकुंठनाथ  डे, बड़ी बेटी वीणा डे और बेटा रूप सनातन डे सभी हजारीबाग जेल में बंद रहे. कर्पूरी साहब अक्सर मुझसे कहते थे कि मैं बहुत झगड़ालू हूं. 
 
एक वाक्या याद करते हुए कहती हैं कि संयुक्त बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू थी, पर हजारीबाग में स्थानीय माफिया की शह पर सोमरस और मधुरस के नाम से इसकी बिक्री जोरों पर थी. मैंने सत्ता का ध्यान दिलाने के लिए अपनी वैनिटी बाॅक्स में शराब की बाेतलें छिपा कर विधानसभा में लेकर गयी और उसे स्पीकर के टेबल पर सजा दिया. रानी कहती हैं कि जनता पार्टी का टूटना देश के लिए घातक रहा. 
 
पुलिस-प्रशासन भी आगे बढ़ने से रोक नहीं सका : स्वरूप कुमार
 
गुमला शहर के जशपुर रोड निवासी 80 वर्षीय स्वरूप कुमार जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं. जेपी आंदोलन को याद करते हुए कहा कि 1974 में वे अध्यक्ष पद पर थे. उन्हें गुमला जेल में चार दिनों तक रखा गया. उसके बाद रांची के सेंट्रल जेल में करीब एक माह तक रखा गया. 
 
उन्होंने बताया कि जेपी आंदोलन के दौरान 1974 में गुमला में डर का माहौल बन गया था. चूंकि सरकार ठीक से नहीं चल रही थी. लोग सरकार के तौर तरीकों से नाराज थे. इसलिए हमलोग सरकार के विरोध में काम कर रहे थे. 1974 में गुमला अनुमंडल के एसडीओ को उनके कार्यालय में प्रवेश करने से रोकने के लिए स्वरूप कुमार ने धरना दिया था, जिसके बाद जेल भेज दिया गया था. 
 
बकौल स्वरूप वह दौर मेरे जीवन का कठिन दौर था. 1974 के समय में जेपी आंदोलन की बैठक पालकोट रोड, सिसई रोड व मेन रोड में रखी गयी थी. पुलिस की पैनी नजर थी. फिर भी मेन रोड के समीप पहुंच कर लोगों से आंदोलन से जुड़ने की अपील की थी. जेपी आंदोलन को सफल बनाने व सरकार के खिलाफ पंपलेट भी बांटे गये थे. गुमला में हमारे आंदोलन को रोकने की प्रशासन ने पूरी तैयारी की थी, लेकिन हम भी किसी से डरने वाले कहां थे.

जब एसपी को निर्देश मिला कि इसे गिरफ्तार कर लो : रमेश सिंह
 
जेपी आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं में शामिल रहे रमेश सिंह कहते हैं कि बीएससी फाइनल परीक्षा दी थी, तभी जेपी आंदोलन शुरू हो गया था. उस वक्त वे 20 वर्ष के थे. इसी दौरान छात्र संघर्ष समिति की बैठक तिलैया में हुई. 
 
बैठक के बाद मौन जुलूस निकाला गया, जिसमें हजारों छात्र शामिल हुए. इसके बाद आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए हम लोगों ने तिलैया बंद का आह्वान किया था. आंदोलन के दौरान कई बार जेल गया. एक बार जेपी का प्रोग्राम कोलकाता में था़ वे गाड़ी से जा रहे थे तभी यूथ कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रियरंजन दास मुंशी ने उनके कार में तोड़फोड़ कर दी. इसके विरोध में झुमरीतिलैया में मेरे नेतृत्व में तत्कालीन सांसद शंकरदयाल सिंह को परेशान किया गया. इसके बाद मेरे कई साथी गिरफ्तार हो गये़ 
 
तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ने हजारीबाग एसपी को निर्देश दिया था कि मुझे व मेरे अन्य साथियों को 24 घंटे में गिरफ्तार करे, लेकिन पुलिस मुझे पकड़ नहीं पायी. 25 जून 1975 की देर रात आपातकाल लागू हुआ तो सरकार के विरोधियों की गिरफ्तारी हो रही थी. इसके विरोध में 26 जून को एक बार फिर मेरे नेतृत्व में तिलैया बाजार बंद करवाया गया. इस दौरान पुलिस पर पथराव भी हुआ. उस समय भी 17 लोग गिरफ्तार किये गये.
 
नाबालिग था इसलिए पुलिस ने चेतावनी देकर छोड़ दिया : वीरेंद्र सिंह
 
गढ़वा जिले के मझिआंव खुर्द  निवासी वीरेंद्र सिंह उर्फ लल्लू वीरेंद्र ने नाबालिग होने के बावजूद जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी़  नतीजतन दो बार गिरफ्तार हुए. लेकिन नाबालिग होने के कारण कुछ दिनों तक हिरासत में रखने के बाद चेतावनी देकर छोड़ दिया गया़  वीरेंद्र सिंह उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि वे राजकीयकृत मुखदेव उवि में आठवीं कक्षा में पढ़ते थे. इसी दौरान कर्पूरी ठाकुर मझिआंव आये थे़  
 
उनका भाषण सुन आंदोलन में शामिल होने के लिए तैयार हो गये़   इसी बीच मझिआंव के मोहन राम के नेतृत्व में सड़क पर उतरने का आह्वान हुआ़  इतना सुनते ही वे मुखदेव उवि से कई बच्चों को लेकर मझिआंव बाजार पहुंचे और तोड़फोड़ में शामिल हो गये़  एक दिन स्कूल से आंदोलन के लिए निकले ही थे कि भूख लग गयी. 
 
फिर क्या था मिठाई दुकान लूट ली.  इस बीच पुलिस दिख गयी, तो भागते हुए कोयल नदी होकर उंटारी स्टेशन चले गये़  वहां भी लूटपाट की़  पुलिस पीछा करते हुए उंटारी रोड पहुंच गयी और उनके साथ 15-20 विद्यार्थियों को हिरासत में ले लिया़   उनलोगों को मझिआंव थाना लाया गया़ फिर गढ़वा भेज दिया गया़  वहां एसडीओ के कैंप जेल में आठ-दस दिनों तक रखा गया़ 

हमें पकड़ने के लिए हर हथकंडे प्रशासन ने अपनाये थे: स्वरूपचंद
 
महंगाई, शिक्षा तथा व्यवस्था परिवर्तन की मांग को लेकर 1974 में पटना में छात्र आंदोलन शुरू हुआ.  इसका नेतृत्व जेपी ने किया़ उसी के बाद हजारीबाग में आंदोलन में अधिवक्ता स्वरूपचंद जैन भी शामिल हुए. स्वरूपचंद बताते हैं कि पहली गिरफ्तारी 18 अगस्त 1974 को और दूसरी गिरफ्तारी 21 मार्च 1976 को हुई. हजारीबाग केंद्रीय कारा में रखा गया. मीसा के तहत हजारीबाग जिले में पहली गिरफ्तारी मेरी हुई. उन्होंने बताया कि हजारीबाग जिले में आंदोलन पूरी तरह शांत रहा. 
 
इसी क्रम में 15 अगस्त 1974 को छात्र संघर्ष ने कर्जन ग्राउंड हजारीबाग में स्वतंत्र रूप से प्रशासन से अलग हट कर झंडोत्तोलन करने का निर्णय लिया. इसमें हजारों लोगों ने भाग लिया था. प्रशासन ने क्षुब्ध होकर इस कार्यक्रम के सक्रिय छात्र नेता राकेश कुमार सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया. छात्रों ने इसके खिलाफ तत्कालीन अनुमंडल दंडाधिकारी राजेश वैश्य के पुराना बस स्टैंड स्थित आवास को घेर लिया. आंदोलन को कुचलने के लिए प्रशासन ने तरह-तरह के हथकंडे अपनाये. विद्यार्थियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाने लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन और तेज होता गया़

तत्कालीन कांग्रेस सरकार से नाराज चल रहे थे लोग : आजाद
 
मेदिनीनगर के समाजवादी नेता तारकेश्वर आजाद जेपी आंदोलन की चर्चा करते हुए कहते हैं कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कामकाज से पूरे देश में आक्रोश था. शायद जून या जुलाई का प्रथम सप्ताह रहा होगा, जब जेपी ने दिल्ली में बड़ी सभा बुलायी थी. 
 
वहां से लौट कर मेदिनीनगर (तब डालटनगंज ) आये ही थे कि कुछ दिनों बाद इमरजेंसी लग गयी़ इससे सामाजिक कार्यकर्ताओं में दहशत थी. उस वक्त के नौकरशाह जो जेपी के नीतियों से प्रभावित थे, वह चाहकर भी आंदोलनकारियों की मदद नहीं कर पा रहे थे. क्योंकि नौकरी जाने का खतरा था. पलामू में यह आंदोलन चरम पर था. आंदोलन के दौरान आजाद पर दो बार मीसा लगाया गया. इमरजेंसी के दौरान तीन माह हजारीबाग जेल और 19 माह मेदिनीनगर जेल में रहे. बकौल आजाद उस समय डालटनगंज जेल में बिहार के कोने-कोने से आंदोलनकारियों को लाकर रखा गया था. 
 
उस समय के तत्कालीन जेलर थे बच्चू बाबू वह आंदोलनकारियों के प्रति थोड़ा नरम रुख रखते थे़ उनके कारण आंदोलनकारियों को थोड़ी राहत थी. वह कहते हैं कि उस वक्त जो लोग राजनीति से जुड़े थे, वह समय और वायदे पक्के थे़ जनता के प्रति समर्पण का भाव था. आज का दौर काफी बदल गया.  

लोगों के सामने एक ही चेहरा था वह थे जयप्रकाश नारायण: करुणा
 
वरिष्ठ स्त्री राेग विशेषज्ञ करुणा झा कहती हैं कि जब संविधान खतरे में था, तो उस समय एक ही चेहरा लोगों के सामने आ रहा था. वह चेहरा था जेपी का. सबको उम्मीद जगी थी यही वह व्यक्ति है जो समाज में परिवर्तन ला सकता है. राजनीति से लोगों का विश्वास उठ चुका था. धर्म व जाति से हट कर लोग उनके साथ जुड़ते जा रहे थे. मुझे याद है कि पटना के कदमकुआं के पास जो बैठक हुई थी उसमेेें समाजवाद विचारधारा के लोग शामिल हुए थे. वर्ष 1974 में गांधी मैदान में हुए आंदोलन में कई लोग अपनी उपाधि त्याग कर उनके साथ जुड़ गये थे. 
 
इमरजेंसी के समय जेपी की किडनी का इलाज मुंबई के जसलोक अस्पताल में चल रहा था. उनको डायलिसिस पर रखा गया था. जेपी ने बिहार से कुछ डॉक्टरों को प्रशिक्षण के लिए बुलाया कि वह डायलिसिस के इलाज की प्रक्रिया सीख लें, लेकिन भय के उस माहौल में कोई जाना नहीं चाहता था. कोई तैयार नहीं हुअा तो मैं प्रशिक्षण में जाने को तैयार हो गयी.

रामगढ़ कॉलेज में पढ़ता था, जेपी से प्रभावित होकर आंदोलन से जुड़ा, दो बार जेल गया : जयप्रकाश
 
गोला रोड निवासी जयप्रकाश नारायण साहू जेपी आंदोलन में दो बार जेल गये. वह आरएसएस के बाल स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे. 1974 में जेपी से प्रभावित होकर आंदोलन में शामिल हो गये. उस समय रामगढ़ कॉलेज में पढ़ते थे. 11 जुलाई 1975 को डिफेंस इंडिया रूल के तहत जेल भेजे गये थे. 
 
यहां से 17 नवंबर 1975 को जेल से बाहर आये. इसके बाद (मीसा) मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्युरिटी एक्ट 1971 के तहत छह माह के लिए जेल गये. जब जेल से बाहर आये, तब पता चला कि 22 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त कर दिया गया है. रामगढ़ कॉलेज से उनके साथ सागर भारती, रामचंद्र पटेल व विश्वनाथ चौधरी भी जेल गये थे. इनमें से विश्वनाथ चौधरी व रामचंद्र पटेल का निधन हो चुका है. उन्होंने बताया कि अब तक सरकार की पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है.
 
228 जेपी आंदोलनकारी, सबको 2016 से पेंशन दे रही है सरकार
 
रांची : झारखंड सरकार ने जेपी (जय प्रकाश) के नेतृत्व में 18 मार्च  1974 से 21 मार्च 1977 की अवधि में प्रजातंत्र का अस्तित्व बचाने तथा जनता  के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए हुए आंदोलन में शरीक लोगों को चिह्नित  करने का काम झारखंड-वनांचल आंदोलनकारी चिह्नितीकरण आयोग को दिया था. इधर आयोग ने जेपी आंदोलन से जुड़े कुल 228 लोगों के नाम की पुष्टि कर इसे सरकार (गृह विभाग) को भेजी थी. 
 
सरकार को इन सबको नवंबर 2016 से पेंशन भुगतान कर रही है. दरअसल सरकार ने निर्णय लिया था कि वह  जेपी आंदोलनकारियों को विभिन्न मानकों के आधार पर सम्मान सहित 2500 से पांच हजार  रुपये तक मासिक पेंशन देगी. इससे पहले आयोग को खुद को जेपी आंदोलनकारी बताने वाले कुल 1485 लोगों के आवेदन मिले थे.
 
इनमें से 611 आवेदन बगैर जरूरी कागजात के थे. इन पर विचार नहीं किया गया. जिन आवेदनों के साथ प्रासंगिक कानून के तहत जेल जाने सहित अन्य कागजात संलग्न थे, उन्हीं की पुष्टि कर उनके नाम गृह विभाग को भेजे गये. इधर 133 आवेदन आंदोलनकारियों की पत्नी सहित अन्य आश्रितों की अोर से दिये गये हैं. इस संबंध में आयोग ने सरकार से निर्देश मांगा है कि ऐसे आवेदनों का क्या किया जाये. क्योंकि सरकार की अधिसूचना में पेंशन या सम्मान सिर्फ वास्तविक अांदोलनकारी को ही दिये जाने का जिक्र है. 
 
मीसा व डीआइआर कानून ही मान्य : जेपी आंदोलनकारियों को अपने अावेदन के साथ प्रमाण के तौर पर मेंटेनेंस अॉफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट ( मीसा) तथा डिफेंस अॉफ इंडिया रूल (डीआइअार) के तहत छह माह या इससे अधिक समय तक जेल में बंद रहने संबंधी प्रमाण पत्र भी देने थे. 
 
इधर आयोग को कुल 513 आवेदन ऐसे मिले हैं, जिनमें मीसा या डीआइआर नहीं बल्कि सीएलए (क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट) के तहत जेल जाने का जिक्र है. ऐसे ज्यादातर आवेदन वाले लोग जेपी आंदोलन से जुड़े तो हैं, पर आंदोलनकारियों को चिह्नित करने संबंधी झारखंड सरकार की अधिसूचना में सिर्फ मीसा व डीआइआर कानून का ही जिक्र है. इसलिए ये आवेदन अभी लंबित हैं. सरकार के स्तर से ही इन पर निर्णय हो सकता है. 

रघुवर दास ने नहीं दिया आवेदन
 
जेपी आंदोलनकारी रहे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सम्मान व पेंशन राशि के लिए आवेदन नहीं दिया है. वहीं खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय तथा नगर विकास मंत्री सीपी सिंह ने आवेदन तो दिया, पर इसके साथ जेल जाने संबंधी कोई प्रमाण संलग्न नहीं था. इसके अभाव में आयोग ने दोनों के आवेदन खारिज कर दिये हैं.
 

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