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vishesh aalekh

  • May 27 2019 1:04AM
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महफूज नहीं यह आशियाना

महफूज नहीं  यह आशियाना

राजेश झा/प्रवीण मुंडा

रांची : राजधानी रांची की आबादी तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में लोगों के लिए यहां रिहाइश का इंतजाम सबसे बड़ी समस्या है. जमीन की बढ़ती कीमतों और मकानों के बढ़ते किराये से बचने के लिए बड़ी संख्या में लोग ऐसे जर्जर मकानों में पनाह लिये हुए हैं, जो कभी भी भरभरा कर गिर सकते हैं. एसइसी की आवासीय कॉलोनी और हरमू हाउसिंग कॉलोनी में इस तरह के मकान बड़ी संख्या में मौजूदा है.

इन जर्जर मकानों पर कुछ दबंग और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का भी कब्जा है, जो या तो इसे किराये पर लगाकर पैसे बना रहे हैं या खुद रह रहे हैं. इन जगहों से शहर में होनेवाली कई आपराधिक गतिविधियों का संचालन होता है. इसकी जानकारी होते हुए भी न तो एचइसी प्रबंधन और न ही जिला प्रशासन कोई कदम उठा रहा है. 

 
ये हाल है!
  • अपने 160 मकानों को क्षतिग्रस्त घोषित कर चुका है एचइसी प्रबंधन, कई लोग जबरन रह रहे हैं  
  • जलापूर्ति की पाइप लाइन टूट चुकी है, बिजली भी चोरी करके जलाते हैं यहां रहनेवाले लोग 
  • दरवाजे और खिड़कियां भी नहीं हैं इन मकानों में, बारिश के मौसम में छतों से टपकता है पानी 
  • शिकायत के बावजूद इन मकानों से लोगों को निकालने की कार्रवाई नहीं कर रहा एचइसी प्रबंधन
 
सबसे पहले बात करते हैं हेवी इंजीनयरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचइसी) के आवासीय कॉलोनी में स्थित जर्जर आवासों की. एचइसी की स्थापना के समय ही इन आवासों का निर्माण किया गया था. लेकिन, सही तरीके से रखरखाव नहीं होने की वजह से मौजूदा समय में 160 से आवासों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है. 
 
एचइसी प्रबंधन इन आवासों को लोगों के रहने के लिहाज से खतरनाक घोषित कर चुका है. इसके बावजूद कई लोग अवैध रूप से इन आवासों में रह रहे हैं. एचइसी प्रबंधन और जिला प्रशासन को भी इसकी जानकारी है, लेकिन यहां रहने वालों को इन मकानों से निकाला  नहीं जा रहा है. 
 
प्रभात खबर की टीम ने जब इन आवासों का मुआयना किया, तो पाया कि इन मकानों में न तो दरवाजे हैं और न ही खिड़कियां. इन मकानों में रह रहे लोगों ने खिड़कियों को ईंटें जोड़कर बंद कर दिया है. देखरेख के अभाव में प्लास्टर भी झड़ रहे हैं. बारिश के मौसम में छत से पानी टपकता है.
 
 इन आवासों में बिजली भी अवैध कनेक्शन के जरिये ही ली गयी है. जलापूर्ति का पाइप भी टूटा हुआ है. इसके बावजूद लोग यहां अवैध रूप से रह रहे हैं. अगर अगर प्रबंधन इन अवासों को  दुरुस्त कर कर्मचारियों को या दीर्घकालीन लीज पर देता है, तो करोड़ों रुपये का राजस्व की प्राप्ति होती.
 
कर्मियों को नहीं मिल रहा है आवास 
एचइसी प्रबंधन के पास आवास उपलब्ध रहने के बावजूद कर्मचारियों को किराये के मकान में रहना पड़ता है, जिसके किराये का भुगतान एचइसी प्रबंधन करता है. इस मद में एचइसी को हर माह लाखों रुपये के अतिरिक्त राजस्व की चपत लग रही है. एचइसी आवासीय परिसर में आवासों की कुल संख्या 11109 है, जबकि 6097 आवासों को प्रबंधन ने दीर्घकालीन लीज पर दे दिया है. 
 
इसके अलावा भी कुछ आवासों को आउट साइड एजेंसियों व राज्य सरकार को भी दिया गया है. कर्मचारियों के लिए केवल 25 सौ आवासों का ही उपयोग हो रहा है. एचइसी में स्थायी व अस्थायी कर्मचारियों की कुल संख्या करीब पांच हजार है. 
 
कहां-कहां है क्षतिग्रस्त और अवैध कब्जा 
एचइसी आवासीय परिसर में अवैध लोगों द्वारा ताला तोड़कर कब्जा किये गये, सेवानिवृत्त हुए लोगों द्वारा जबरन कब्जा किये गये  और क्षतिग्रस्त घोषित हो चुके आवासों की संख्या करीब 300 है. जानकारी के अनुसार टाइप-बी के 80 आवास, टाइप-एसटी के 100 आवास, टाइप-डीटी के 50 आवास, टाइप-डी के 70 आवास और टाइप-सी के 50 आवास क्षतिग्रस्त या अवैध कब्जे की सूची में है. 
 
करोड़ों रुपये की होती है हानि
एचइसी प्रबंधन यदि 160 क्षतिग्रस्त आवासों को दुरुस्त कर कर्मियों को या दीर्घकालीन लीज पर देता, तो करोड़ों रुपये के राजस्व की बचत होती. मसलन टाइप-बी के आवास को अगर कर्मचारियों को दिया जाता है, तो 55 रुपये मासिक किराया वेतन से काटा जाता है. अगर यही आवास बाहरी लोगों को मासिक किराये पर दिया जाता है, तो 5400 रुपये प्रतिमाह किराया लिया जाता है. इन अवासों को एलटीएल पर देने पर 10 लाख से अधिक एक आवास से एकमुश्त प्रबंधन को मिलेगा. 
 
आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भी रहते हैं यहां 
एचइसी के क्षतिग्रस्त आवासों में किस तरह के लोग रहते हैं, इसकी जानकारी न तो एचइसी प्रबंधन को है और न ही जिला प्रशासन को. इन आवासों में रहनेवाले लोगों की शिकायत एचइसी के कर्मियों ने प्रबंधन से भी की है, लेकिन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई अब तक नहीं की गयी है.
 
 कर्मियों का आरोप है कि यहां के कई क्षतिग्रस्त आवासों में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का कब्जा है. राजधानी का सबसे चर्चित ‘लव भाटिया अपहरण कांड’ भी यहीं हुआ था. अपराधियों ने लव भाटिया का अपहरण कर उन्हें यहीं के एक क्वार्टर में छिपाया था. पुलिस ने इनकाउंटर के बाद लव को अपराधियों के चंगुल से सुरक्षित मुक्त कराया था. 
 
दुर्घटना में बच्ची की गयी है जान
एचइसी आवासीय परिसर के क्वार्टरों की स्थिति यह हो गयी है कि कभी भी ध्वस्त हो सकते हैं. पिछले दिनों एचइसी आवासीय परिसर स्थित एसटी-764 के पीछे चहारदीवारी गिरने से छह साल की बच्ची रिया कुमारी की मौत हो गयी थी. वह क्वार्टर के पीछे चहारदीवारी के पास जमीन पर गिरी हुई लीची चुन रही थी. इसी दौरान अचानक चाहरदीवारी गिर गयी. 
 
40 साल से ज्यादा पुराने हैं हरमू हाउसिंग कॉलोनी के मकान 
रांची :  हरमू हाउसिंग कॉलोनी रांची की सबसे बड़ी आवासीय इलाका है. शहर की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस कॉलोनी में निवास करता है. इनमें से भी बड़ी संख्या में लोग ऐसे मकानों में रह रहे हैं, जो बुरी तरह जर्जर हो चुके हैं और कभी भी गिर सकते हैं. आवास बोर्ड द्वारा इन मकानों का निर्माण अलग-अलग समय में कराया गया है. यहां के सबसे पुराने मकान 1970 के दशक के शुरुआती दौर में बने थे. यानी कई मकान करीब 40-50 वर्ष पुराने हो चुके हैं. 
 
मेंटनेंस अौर देखरेख के अभाव में ये मकान काफी कमजोर हो चुके हैं. एलआइजी श्रेणी के मकान, वीकर सेक्शन अौर जनता फ्लैट (सभी नहीं) की स्थिति काफी खराब है. धूसर से दिखने वाले इन मकानों की बाहरी हालत ही स्थिति बता देने को काफी है. मकानों का रंगरोगन उड़ चुका है, दीवारों में दरार पड़ने लगी है. 
 
कुछ मकान ऐसे हैं, जहां दरार में पीपल और कई अन्य तरह के पौधे उग आये हैं. इनकी जड़ों की वजह से दरार और चौड़ी हो रही हैं. इन आवास में रहनेवाले कुछ लोगों ने बताया कि सीलिंग भी झड़ने लगी है अौर छड़ नजर आ रही है. इससे कभी भी कोई बड़ा हादसा होने की आशंका है. लेकिन, कोई दूसरा विकल्प नहीं होने की वजह से ये लोग ऐसे ही मकानों में रहने को विवश हैं.

रेंटल परपस से बनाये गये थे ये आवास 
बिहार राज्य आवास बोर्ड का गठन 1972 में किया गया था. उस समय सरकारी कर्मचारियों के लिए रेंटल परपस से कुछ आवास बनाये गये थे. लोगों को बहुत ही कम रेंट पर उन आवासों को आवंटित भी किया गया था. बाद में अौर आवास बने. राज्य गठन के बाद बोर्ड का नाम झारखंड राज्य आवास बोर्ड किया गया. 
 
बोर्ड द्वारा निर्मित ये आवास कमजोर आय वर्ग, अल्प आय वर्ग, मध्यम आय वर्ग अौर उच्च आय वर्ग के हिसाब से अलग-अलग कैटेगरी में बनाये गये थे. कई आवास ऐसे थे जो कभी अलॉट नहीं हो पाये. वे देखरेख के अभाव में जर्जर हो चुके हैं. इन आवासों का बोर्ड द्वारा मेंटनेंस नहीं कराया गया. यहां रहने वाले लोग ही अपने स्तर पर मेंटनेंस कराते रहे हैं. 
 
इसके अलावा कॉलोनी के अंदर सीवरेज अौर नाली तो कभी बना ही नहीं. अब हालात यह है कि इन मकानों के साथ जुड़ा वर्षों पहले पानी निकासी के पाइप सड़ चुके हैं. इनसे होकर निकलने वाला पानी मकानों की दीवारों को खराब कर रहा है. हालात यह है कि इमारत की बाहरी दीवारों की ईंटें तक झड़ने लगी हैं. इससे पूरी इमारत कमजोर हो गयी है.
 

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