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vishesh aalekh

  • Nov 16 2017 8:01PM

शेल कंपनी कथा : चोर दरवाजों को तबाह करना ही होगा

शेल कंपनी कथा : चोर दरवाजों को तबाह करना ही होगा

हरिवंश

राज्‍यसभा सांसद 

शेल कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई असाधारण साहस का काम है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सर्वाधिक जोखिम का काम है. जहां एक मामूली संगठन, समूह, अनधिकृत-गैरकानूनी यूनियन के आगे सरकारें घुटने टेकती हैं, राजनीतिक दल वोट बैंक के लिए चिरौरी करते हैं, वहां यह साहस अभूतपूर्व है. आज की कड़ी में जानिए, भ्रष्टाचार को मजबूत करनेवाली ये शेल कंपनियां क्या हैं और कैसे काम करती हैं.

 

16 जुलाई को 'ऑल पार्टी मीट' में विपक्षी नेताओं के समक्ष नरेंद्र मोदी ने कहा, हम लोगों (नेता) की इमेज चोर, डाकू की हो गयी है, यह सहन के बाहर है. कोई भी हो, सख्त-से-सख्त कार्रवाई होगी. राजनीतिक प्रतिशोध की बात कह कर कोई बच नहीं सकता. विपक्ष के एक नेता ने, जो इस बैठक में शरीक थे, हमें बताया कि प्रधानमंत्री की इस बात को हम सब मौन रह कर सुने, क्योंकि हमें पता है कि इस मामले में वह सही हैं. उन्हीं दिनों लालू परिवार की बेनामी संपत्ति के तथ्य उजागर हुए थे और उसमें शेल कंपनियों की भूमि का सामने आयी थी. शेल कंपनियों पर अप्रैल 2017 में देशव्यापी छापे पड़े, उसके बाद लगातार निर्णायक कार्रवाई उनके खिलाफ हो रही है. देशव्यापी स्तर पर. 

23 अक्तूबर टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर. पहले पेज पर : शेल कंपनियों में नोटबंदी के दौरान जमा गलत पूंजी पर आपराधिक कार्रवाई शुरू. 

छह सितंबर इकोनोमिक टाइम्स लीड खबर : दो लाख से अधिक शेल कंपनियों के खाते सील. डिमोनेटाइजेशन के बाद तीन लाख शेल कंपनियों की पहचान हो चुकी है. अगस्त में सरकार ने खुलासा किया कि 37000 रोल कंपनियों की पहचान हो चुकी है, जो ब्लैक मनी और हवाला का धंधा करती हैं.

22 अगस्त, मिंट की लीड खबर : 100 ब्रोकरों की शिनाख्त, जिन्होंने शेल कंपनियों की मदद कर 16000 करोड़ मनी लांड्रिग में मदद की. 

द हिंदू में नौ अगस्त को छपी खबर : 331 शेल कंपनियों की ट्रेडिंग पर सेबी ने अचानक पाबंदी लगायी. सेंसेक्स में 0.8 फीसदी गिरावट. माना जा रहा है कि इन मुखौटों कंपनियों पर सेबी की यह अचानक कार्रवाई पिछले साल मुंबई-कोलकाता के आयकर विभाग को मिली सूचना के आधार पर हुई. जांच में पाया गया कि ऐसे ट्रांजेक्शन हुए, जिनमें मामूली ट्रेडिंग वाले शेयरों की खरीद फरोख्त हुई. इसका मकसद कुछ और था.

सात सितंबर को मिंट की खबर : सरकार ने शेल कंपनियों के डायरेक्टर्स पर पाबंदी लगायी, तीन लाख डायरेक्टर्स इससे प्रभावित होंगे. 

सात सितंबर, दिल्ली के एक हिंदी दैनिक की खबर : शेल कंपनी के खाते से पैसे निकालनेवाले डायरेक्टर को होगी 10 साल की जेल. धोखाधड़ी में आम लोगों को नुकसान हुआ, तो कम-से-कम तीन साल की सजा. साथ ही सेल कंपनियों के सीए और कंपनी सेक्रेटरी की भी पहचान. यह कठोर फैसला भी सरकार ने लिया कि जिन शेल कंपनियों ने तीन साल से रिटर्न फाइल नहीं किया है, उनके डायरेक्टर उस कंपनी या अन्य कंपनी में डायरेक्टर नहीं बन सकते हैं. इससे अब तीन लाख डायरेक्टर, किसी अन्य कंपनी में डायरेक्टर नहीं बन पायेंगे.

मार्च-अप्रैल 2017 से शेल कंपनियों के खिलाफ लगातार कठोर कार्रवाई चल रही है. इनके खिलाफ ऐसा कभी नहीं हुआ. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह असाधारण जोखिम है. जहां एक मामूली संगठन, समूह, अनधिकृत-गैरकानूनी यूनियन के आगे सरकारें घुटने टेकती हैं, राजनीतिक दल वोट बैंक के लिए चिरौरी करते हैं, वहां यह साहस करना, सामयिक घटनाक्रम का असाधारण अध्याय है. 

अब ये शेल कंपनियां करती क्या हैं?

ये वस्तुत: ब्लैकमनी व हवाला के मुखौटे हैं. शेल कंपनियों का अस्तित्व सिर्फ कागज पर है. वे कोई आधिकारिक कारोबार या उत्पादन नहीं करतीं. इनका इस्तेमाल मनीलांड्रिंग के लिए किया जाता है. सामान्य कंपनियों की तरह इनमें भी डायरेक्टर्स होते हैं. मामूली पगार वाले लोग एक साथ 20-25 शेल कंपनियों के डायरेक्टर्स होते हैं. असली मालिक गुमनाम रहता है. डायरेक्टर्स भी फर्जी रहते हैं. शेल कंपनियों द्वारा निर्यात का फर्जी बिल बना कर विदेशों से भारत में पैसे लाये जाते हैं. ऐसी कंपनियां बनानेवालों में बड़े राजनेता और बड़े कारोबारी शामिल हैं. काले धन के खिलाफ जंग जीतने के लिए इन चोर दरवाजों या गुप्त सुरंगों को तबाह करना ही होगा. शेल कंपनियां बनती ही हैं टैक्स बचाने के लिए और चार्टर्ड एकाउंटेंट जैसे सम्मानित क्षेत्र के लोग अपनी योग्यता-हुनर का इस्तेमाल इन चोर दरवाजों को पुख्ता करने में करते हैं. शेल कंपनियों के वास्तविक संचालक तक कानूनन पहुंच पाना बड़ी चुनौती है. 

सरकार यह भी जांच करवा रही है कि शेल कंपनियों का राजनीतिक नेताओं और बड़े कारपोरेट दिग्गजों से क्या लिंक है? जितनी शेल कंपनियां अब तक पकड़ी गयी हैं, उनमें 60 फीसदी कंपनियां तो सिर्फ कागज में ही है. उनका कोई ऑफिस तक नहीं है. रजिस्‍ट्रेशन के समय इन कंपनियों ने जो पते दिये, उनमें किसी और कंपनी का ऑफिस है. एक ही पते पर कई शेल कंपनियों के रजिस्‍ट्रेशन मिले हैं. जांच के बाद पता चला कि वे सभी पते फर्जी हैं. 

वित्त मंत्रालय से मिले संकेतों के अनुसार शेल कंपनियों के डायरेक्टर्स से पूछताछ की प्रक्रिया चल रही है. वित्त मंत्रालय की फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट और इनकम टैक्स विभाग शेल कंपनियों के डायरेक्टर्स से पूछताछ करेगा. सरकार गंभीर कोशिश कर रही है कि पता चले कि इन शेल कंपनियों को बनाने के पीछे किनका हाथ है? कौन हैं वे लोग जो शेल कंपनियों के जाल के पीछे हैं? उल्लेखनीय है कि लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती और उनके पति के खिलाफ इडी मनीलांड्रिंग मामले की जांच कर रहा है. इन दोनों पर यह आरोप है कि इन्होंने शेल कंपनियों के जरिये अपनी ब्लैकमनी को ह्वाइट से बदला और मनी लांड्रिंग की. आयकर विभाग और सीरियस फ्रॉड इनवेस्टिगेशन कार्यालय (एसएफआइओ) शेल कंपनियों पर लगातार कार्रवाई कर रहे हैं. जानकारी मिली है कि कुल 10 लाख कंपनियों पर आयकर विभाग की नजर है. 

एक मित्र चार्टर्ड एकाउंटेट से शेल कंपनियों का कामकाज समझा. पुन: नवभारत टाइम्स में छपी खबर से स्पष्ट हुआ. फर्ज करें, मोहन 50 लाख की काली कमाई को ह्वाइट या वैध करना चाहता है. वह परिचित ब्रोकर से ऐसी कंपनियों के 50,000 शेयर 10 रुपये के भाव से खरीदने की बात तय करता है. इन शेयरों का ट्रेड कहने के लिए होता है. नाममात्र. मोहन चेक से पांच लाख रुपये देता है. शेयर उसके डीमैट खाते में आ जाते हैं. यह पूरी प्रक्रिया वैध दिखती है. लगभग वर्षभर बाद शेयर का भाव बढ़ाया जाता है (अक्सर प्रोमोटर के संकेत पर काम करनेवाले ऑपरेटरों के जरिए) और 100 रुपये तक पहुंचाया जाता है. फिर मोहन उस प्रोमोटर ग्रुप फर्म को शेयर बेचता है, जिससे उसने खरीदा था. ऐसा फर्म प्रोमोटर की ओर से शेयर होल्ड करनेवाली इकाई हो सकती है. मोहन को 50 लाख रुपये (100 रुपये के भाव पर 50,000 शेयर बिक्री पर) का चेक मिलता है, लेकिन वह उस नकदी ब्लैक मनी (जिसे वह वैध बनाना चाहता था) को फीस के साथ लौटा देता है. इस तरह मोहन पहले पांच लाख रुपये का चेक देता है, फिर 50 लाख रुपये का चेक पाता है और नकदी लौटा देता है. कृत्रिम तरीके से 100 रुपये तक ले जाया गया शेयर प्राइस एक दूसरे शख्स (इन्हें सोहन मान लें) को इधर लाता है. सोहन छिपी आय को ह्वाइट करना चाहता है. वह टैक्स पेमेंट घटाने के लिए लॉस बुक करने (घाटा दिखाने) के लिए कैश लेने को तैयार है. वह 50,000 शेयर खरीदने के लिए 50 लाख का चेक देता है और शेयर की कीमत में गिरावट का इंतजार करता है. फिर वह लॉस बुक करने के लिए शेयर बेचता है और पांच लाख का चेक पाता है और 45 लाख का लॉस उठाता है. फिर वह कैश (सर्विस फी घटाकर) बायर से (जिसने सोहन को शेयर बेचे थे) लेता है. यह है शेल कंपनियों का मायाजाल या गोरखधंधा. इससे सरकार को टैक्स नहीं मिलता. सरकार कर्ज लेने को विवश होती है. 

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आइसीएसआइ (इंस्टीट्यूट आफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया) के बीच भाषण में (संस्था की गोल्डन जुबली के अवसर पर) शेल कंपनियों की चर्चा की. कहा, नोटबंदी के बाद जिन तीन लाख संदिग्ध कंपनियों के बारे में पता चला था, जिनके माध्यम से काले धन के लेन-देन की आशंका है, उनमें से दो लाख 20 हजार कंपनियों का रजिस्‍ट्रेशन रद्द किया जा चुका है. हमारे देश में एक कंपनी भी बंद करो, तो काले झंडों के जुलूस निकलते हैं. दो लाख 10 हजार कंपनी बंद की है. कोई समाचार नहीं आ रहा है. न कोई मोदी का पुतला जला रहा है. यानी कितनी झूठी दुनिया चलती थी. प्रधानमंत्री ने कहा कि इन शेल कंपनियों के खिलाफ इस सफाई अभियान के बाद डायरेक्टरों में भी जागरूकता बढ़ेगी, यह उम्मीद है. इसके असर से कंपनियों में भी पारदर्शिता आयेगी. 

इन शेल कंपनियों के धंधे से परिचित एक चार्टर्ड एकाउंटेंट ने बताया कि कांग्रेस राज ने जानते हुए इन कंपनियों को बढ़ावा दिया. खुद 'नेशनल हेराल्ड' प्रकरण में ऐसी ही फर्जी कंपनी की भूमिका है. 1982-83 से यह फैलना शुरू हुआ. उनके अनुसार कोलकाता के चार्टर्ड एकाउंटेंट के मस्तिष्क की यह उपज थी. पहले इनके शेयर होल्डर्स जेनुइन होते थे. बाद में फेक शेयर होल्डर्स होने लगे. बैंक मैनेजर इनसे मिले होते थे. आधार या केवाइसी से भी इस धंधे को नुकसान हुआ है. कोलकाता से मुंबई, दिल्ली होते हुए पूरे देश समेत दुनिया के टैक्स हेवन देशों में ये शेल कंपनियां पहुंचीं. यह भी धंधा चला कि एक ऐसी कंपनी बनाकर एक चार्टर्ड एकाउंटेट को बेचने का लाभ भारी है. कई स्तरों पर यह पूंजी बंटती है. बहुत बड़े घराने 'जमाखर्ची' के लिए ऐसी कंपनी बनाते हैं. भारत सरकार या आयकर को इन कंपनियों से क्या आर्थिक नुकसान होता है, वह एक अलग अध्याय है. भ्रष्ट अफसरों-शेल कंपनियों के संचालक, देश को लाखों करोड़ का नुकसान पहुंचाते हैं. 

दरअसल भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में शेल कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई एक निर्णायक और महत्वपूर्ण अध्याय है. अगर सभी राजनीतिक दल नीतीश कुमार की तरह इस भ्रष्टाचार उन्मूलन मुहिम (वैचारिक भिन्नता देखते हुए) में शरीक हों, तो भारत बहुत जल्द दुनिया में निर्णायक पहचान-हैसियत पा सकता है.

 

काला धन छुपाना अब मुश्किल

मोदी सरकार ने जब से ब्लैक मनी के खिलाफ डिमोनेटाइजेशन समेत अनेक सख्त कदम उठाये और कानून बनाये, उसके बाद से लगातार बड़े मगरमच्छ पकड़ में आ रहे हैं. बाहरी देशों से भी इस कदर कानूनी समझौते किये गये हैं कि बड़े लेनदेन देश और देश के बाहर अब छुपाना कठिन होगा. एक तरफ सरकार ने 'एंटी ब्लैक मनी डे' का आयोजन किया, तो दूसरी तरफ विपक्ष ने इसके विरोध में आयोजन किया. इसी अवसर पर 19 टैक्स हैवेंस (टैक्स चुराने के स्वर्ग यानी माकूल देश) से बड़ी सूची जारी हुई है. टैक्स चोरी, रीयल स्टेट की अवैध कमाई, हवाई जहाजों की खरीद में चोरी, समुद्री जलयान वगैरह की खरीद में भारी राशि बाहर ले जायी गयी. इसमें नीरा राडिया, कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री का परिवार, विजय माल्या, बड़े डॉक्टरों, भाजपा सांसदों के नाम सामने आये हैं. केंद्र सरकार ने तत्काल इस सूची में शामिल कंपनियों की जांच का काम संबंधित एजेंसियों को सौंप दिया है. 

एक नवंबर(टाइम्स ऑफ इंडिया) की खबर है कि कारपोरेट घराने के लॉबिस्ट(हिंदी में इसके लिए प्रचलित शब्द है, दलाल) दीपक तलवार की 1000 करोड़ की अघोषित आय पर आयकर ने नजर डाला है. कई विदेशी एयरलाइंसों को सरकार से मंजूरी दिलाने, एफडीआई प्रोजेक्ट्स मंजूर कराने जैसे काम भी तलवार नरसिंहराव के जमाने से करते रहे हैं और यूपीए के शासन में नगर विमानन मंत्रालय में बड़ी डील कराने का आरोप है. ऐसे लोग एनजीओ चलाते थे, जिन्हें बाहर से 100-100 करोड़ की फंडिंग आती थी. दरअसल देश में ऐसे लॉबिस्टों की नयी पौध या जाति पिछले 40-50 वर्षों में 'बरगद' बन गयी थी. बिना कल-कारखाने, उत्पादन या आय के हजारों-हजारों करोड़ के मालिक महज सरकार सौदों की दलाली से. 

एक सप्ताह पहले प्रोफेसर आर वैद्यनाथन की नयी पुस्तक 'ब्‍लैक मनी एंड टैक्स हेवेंस' (वेस्टलैंड पब्लिकेशंस) आयी है. 30 वर्षों तक आइआइएम बेंगलुरु में पढ़ाने के दौरान ही वह देश-दुनिया में 'ब्‍लैक मनी' के प्रामाणिक अध्येता के रूप में जाने गये. वह कहते हैं कि भारत में कितना कालाधन हो सकता है, उनके अनुसार यह अनुमान अलग-अलग है. भारत के कुल जीडीपी का 10 से 20 फीसदी के बीच. कंजरवेटिव रूप से 15 लाख करोड़. वर्ष 2016-17 में भारत का कुल जीडीपी 150 लाख करोड़ था, उसका 10 फीसदी यानी 15 लाख करोड़. दुनिया के 'टैक्स हेवेंस' (जहां देश का टैक्स चुरा कर धन या काला धन आराम से रखा जाता है) देशों में अनुमान है कि भारत का 65 लाख करोड़ का काला धन चुरा कर रखा गया है. 

एक जाने माने चार्टर्ड एकाउंटेंट बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्थिति पैदा कर दी है कि (1) अब ब्लैक मनी जेनरेट करना लगभग नामुमकिन हो गया है. (2) देश में जो ब्लैक मनी है, वह आधार-बैंक खाता-पैन जुड़ने, नगदी बड़े भुगतान न होने से मुसीबत में है. या तो वह पकड़ में आयेगी या अनुपयोगी हो जायेगी. (3) बाहर जमा ब्लैक मनी अब न आप देश में ला सकते हैं. न एक साथ बड़ी मात्रा में बाहर खर्च कर सकते हैं. इस तरह ब्लैक मनी घर के अंदर या बाहर अनुपयोगी होने की स्थिति में है. इसी कारण देश का सबसे ताकतवर भ्रष्टाचार पोषित दलाल, राजनीतिक-व्यवसायी वर्ग नरेंद्र मोदी के खिलाफ भयावह गुस्से में है. 

बीवी कुमार की पुस्तक 'अंडरग्राउंड इकोनोमी' में विस्‍तार से उन तौर-तरीकों का उल्लेख है, जिनके तहत काले धन का अकूत भंडार देश में व देश के बाहर बना. इस पुस्तक में कई स्तब्धकारी तथ्य हैं कि कैसे 1991 से 1995 के बीच मुंबई के 12 अलग-अलग बैंकों से धन की हेराफेरी हुई. इसमें शेल कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. 

दरअसल पिछले तीन वर्षों में जो गंभीर कदम उठे हैं, इनसे पहली बार 'भ्रष्टाचार व कालाधन' ही राजनीति के मुख्य एजेंडा नहीं हैं, बल्कि कैसे पहली बार इस जानलेवा कैंसरग्रस्त बीमारी को ठीक करने के सख्त व कठोर कदम उठाये गये हैं, यह सर्वाधिक चर्चा में है. 

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