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vishesh aalekh

  • Jun 11 2019 7:17AM
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गिरीश कर्नाड स्मृति शेष : एक खत से बदल गयी जिंदगी...

गिरीश कर्नाड स्मृति शेष : एक खत से बदल गयी जिंदगी...

मशहूर बॉलीवुड अभिनेता, साहित्यकार और रंगकर्मी गिरीश कर्नाड का सोमवार को 81 साल की उम्र में बेंगलूरु में निधन हो गया. गिरीश को बचपन से ही नाटकों में रुचि थी. स्कूल के समय से ही उन्होंने थियेटर में काम करना शुरू कर दिया था. कर्नाड जब 17 साल के थे, तब उन्होंने आइरिस लेखक ‘सीन ओ कैसी’ की स्केच बनाकर उन्हें भेजा, इसके बदले में उन्होंने गिरीश को एक पत्र भेजा. 

पत्र में उन्होंने लिखा था कि गिरीश यह सब करके अपना वक्त जाया न करें, बल्कि कुछ ऐसा करें, जिससे एक दिन लोग उनका ऑटोग्राफ मांगें. खत मिलने के बाद गिरीश ने चित्रकारी बंद कर दी. इंग्लैंड से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में सात साल तक काम किया. काम में मन नहीं लगा तो नौकरी से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद वे थियेटर के लिए समर्पित होकर काम करने लगे. 

गणित से थी नफरत, विदेश जाने के लिए बने मैथ्स टॉपर :  उस जमाने में हर कोई विदेश में जाकर पढ़ना चाहता था. गिरीश भी पढ़ाई के लिए विदेश जाना चाहते थे. ऐसे में सिर्फ एक ही रास्ता था कि गिरीश कर्नाड प्रथम श्रेणी से ग्रेजुएशन करें. उन्होंने इसके लिए मजबूरन गणित को चुना, यह अलग बात है कि गणित से उन्हें नफरत थी. गिरीश यूनिवर्सिटी टॉपर बने और उन्हें विदेश जाने का मौका मिला.   

गौरी लंकेश मर्डर केस में उठायी आवाज : गिरीश कर्नाड की तमाम राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका रही. धर्म की राजनीति और भीड़ की हिंसा पर भी कर्नाड ने तमाम प्रतिरोधों में हिस्सा लिया. कर्नाड ने सीनियर जर्नलिस्ट गौरी लंकेश की मर्डर पर बेबाक अंदाज में आवाज उठायी थी. विरोध प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया था. 

गिरीश कर्नाड

जन्म 19 मई, 1938

मृत्यु 10 जून, 2019

 पुरस्कार/सम्मान 

1971 बेस्ट डायरेक्टर कैटेगरी में नेशनल अवॉर्ड  

1972 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

1973 बेस्ट फीचर फिल्म काडु के लिए नेशनल अवॉर्ड 

1974 पद्म श्री सम्मान

1992 कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण सम्मान 

1994 साहित्य अकादमी पुरस्कार

1998 ज्ञानपीठ पुरस्कार, कालिदास सम्मान

मालगुडी डेज से घर-घर में बनायी पहचान 

हिंदी दर्शकों के बीच 1986-87 के दौरान दूरदर्शन पर आये धारावाहिक मालगुडी डेज से उन्होंने अपनी पहचान बनायी. इसमें वह स्वामी के पिता मास्टर मंजुनाथ की भूमिका निभायी थी. 

मंथन के लिए किसानों ने दिया था दो रुपये का दान 

फिल्म मंथन कोई नहीं भूल सकता. इसके लिए पांच लाख किसानों ने दो-दो रुपये दान दिया था. 1976 में आयी इस फिल्म को श्याम बेनेगल ने निर्देशित किया था. ये श्वेत क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन से प्रेरित थी.

 

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