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patna

  • Aug 20 2019 8:02AM
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चार दशक तक उतार-चढ़ाव भरा रहा डॉ जगन्नाथ मिश्र का सियासी सफर

चार दशक तक उतार-चढ़ाव भरा रहा डॉ जगन्नाथ मिश्र का सियासी सफर
देखो, बलुआ बाजार रूल कर रहा है
डॉ मिथिलेश
 
पटना : जगन्नाथ मिश्र के जीवन के आखिरी दो दशक भले ही क्षेत्रीय पार्टियों के हवाले रहा हो पर वे आजन्म कांग्रेसी ही थे. कांग्रेसी सस्कार में पला बढ़ा उनका जीवन कभी भी इसके इतर नहीं रहा. सबसे कम उम्र में बिहार के मुख्यमंत्री बनने वाले डॉ मिश्र के बारे में यह बात प्रचलित थी कि देखो बलुआ बाजार रूल कर रहा है. आधुनिक सुपौल जिले के बलुआ बाजार के मूल निवासी डॉ मिश्र चार दशक तक बिहार की राजनीति में छाये रहे. 
 
अस्सी के दशक में तो बिहार की राजनीति में उनकी तूती बोलती थी. चाहे, जब वे मुख्यमंत्री रहे तब भी और जब इस पद से हटाये गये तब भी. बिंदेश्वरी दूबे, चंद्रशेखर सिंह, भागवत झा आजाद और सत्येंद्र नारायण सिंह की सरकारें उनकी रहमो करम पर ही चलती रही. तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने डॉ मिश्र जब कांग्रेस छोड़ गये तो उनके कद का दूसरा नेता पार्टी को नहीं मिल पाया. ना सिर्फ अपने स्वजातीय ब्राहम्णों में बल्कि हर तबके में उनके समर्थक थे. जनता दरबार की शुरुआत करने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. 
 
बतौर मुख्यमंत्री जिन इलाकों में उनका भ्रमण होता था, क्षेत्र के प्रमुख लोगों को पोस्टकार्ड से सूचना दी जाती थी. उन दिनों पोस्टकार्ड का ही प्रचलन था. तीसरी बार महज कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री रहे डॉ मिश्र बढ़ती उम्र के बाद भी प्रतिदिन जनता दरबार में लोगों से मिलना और ताबड़तोड़ फैसले के लिए चर्चित रहे. राजनीति में उन पर बाद के दिनों में लालू प्रसाद से राजनीतिक सांठगांठ का आरोप भी लगता रहा, पर उन्होेंने अपने विरोधियों की कभी परवाह नहीं की. 
 
एक बार उन्होेंने अपने नाम के आगे मिश्र टाइटल हटाने का फैसला लिया. उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने का फैसला हो या शिक्षकों की वेतन बढ़ोतरी का निर्णय, डॉ मिश्र फैसले लेने में देर नहीं करते थे. 
 
डॉ जगन्नाथ मिश्र अविभाजित बिहार के ऐसे नेता थे, जिनकी पहचान हर इलाके में हर तबके के लोगों में थी.  सत्तर और अस्सी के दशक मेें बिहार के भीतर और बाहर दो ही नेता चर्चा के केंद्र में होते थे. एक जननायक कर्पूरी ठाकुर थे तो दूसरी ओर डॉ जगन्नाथ मिश्र.  
 
अपने बड़े भाई तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के बाद 11 अप्रैल, 1975 को वे पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बनाये गये. महज 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बनना कांटों का ताज ही था. लेकिन उन्होंने अपनी सुझ बूझ का परिचय दिया और करीब दो साल से अधिक समय तक इस पद पर रहे. दूसरी बार आठ जून, 1980 को वे राज्य के मुख्यमंत्री बनाये गये. यह उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल था. 
 
14 अगस्त, 1983 तक वे इस पद पर रहे.कांग्रेस की तत्कालीन राजनीतिक उठापटक में उन्हें अपने पद से हाथ धोना पड़ा और चंद्रशेखर सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये गये.तीसरी बार डॉ मिश्र छह दिसंबर, 1989 को मुख्यमंत्री बने और 10 मार्च, 1990 तक इस पद पर रहे. उनके बाद लालू प्रसाद मुख्यमंत्री हुए. आखिरी बार पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बने. 
 
वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व राज्य सूचना आयुक्त अरुण वर्मा डॉ मिश्र को याद करते हुए कहते हैं, उन दिनों आकाशवाणी समाचार का बड़ा प्रभाव था. डॉ मिश्र इसकी अहमियत समझते थे, सरकार की कोई भी छोटी बड़ी खबर अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, इसके लिए वो आकाशवाणी समाचार को प्रमुखता देते थे. 1994 के आसपास उन्होंने जब कांग्रेस छोड़ी तो अपनी पार्टी बिहार जन कांग्रेस पार्टी बनायी. 
 
कुछ दिनाें के बाद वे राकांपा में भी शामिल हुए. इसके बाद 2004 के आसपास वे जदयू मे शामिल हुए. लेकिन, इसके बाद भी कांग्रेस के नेताओं से उनका नाता व्यक्तिगत तौर पर निभता रहा. कांग्रेस के स्टालवार्ट माने जाने वाले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से उनका जीवन पर्यंत नाता बना रहा.  
 
प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष श्याम सुंदर सिंह धीरज बताते हैं, डॉ मिश्र कांग्रेस के ही थे. उनके परिवार के लोगों ने ही कांग्रेस को सींचा. धीरज कहते हैं, उस जमाने में लोग कहते थे, देखो  बलुआ बाजार रूल कर रहा है. बाद के दिनों में जब उन्होंने कांग्रेस छाेड़ने का फैसला लिया तो प्रदेश की राजनीति में उनकी राजनीतिक अहमियत उतनी नहीं रही, जितनी अस्सी के दशक में थी.
 
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