Advertisement

vishesh aalekh

  • Nov 9 2018 6:42AM

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 150 साल : गांधी के अंतिम दिन नोआखाली की अंधेरी सुरंग

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 150 साल : गांधी के अंतिम दिन नोआखाली की अंधेरी सुरंग

हरिवंश

उपसभापति, राज्यसभा

यूं तो गांधी ने अनेक जगहों से प्रेरणा ली, लेकिन उनके जीवन पर तीन लोगों का गहरा प्रभाव रहा. वे गांधी के शिक्षक सरीखे थे- जॉन रस्किन, हेनरी थोरो और लियो टॉलस्टॉय. लियो टॉलस्टॉय से गांधी बड़े प्रभावित थे. टॉलस्टॉय को गांधी का आध्यात्मिक गुरु कहा जाता है. 

गांधी का जब उदय हो रहा था, तब टॉलस्टॉय अपने जीवन की सांध्य बेला में थे, लेकिन कई प्रसंग ऐसे हैं, जिनसे पता चलता है कि अपने विचारों से, कर्मों से गांधी को गहराई से प्रभावित करनेवाले टॉलस्टॉय आखिरी समय आते-आते खुद गांधी के प्रभाव में आ गये थे. टॉलस्टॉय का जीवन अजीब था. अपनी उम्र के छठे दशक में टॉलस्टॉय ने अपना जीवन पूरी तरह बदल लिया था. वह सादा जीवन बिताने लगे. नंगे पांव रहते. खेती करते. किसानों की तरह कपड़े पहनते. नशा छोड़ चुके थे. शिकार करना भी बंद कर दिया था. मांसाहार से तौबा कर चुके थे. बाहरी तानाबाना तो बदला ही था, मन भी विरक्त था. 

1891 आते-आते पूरी तरह से गांववालों से एकाकार जीवन जीने लगे थे. दुनिया के हर धर्म में रुचि लेने लगे थे. उनसे संवाद कर जीवन का अर्थ तलाशने लगे थे. महान रचना 'वार एंड पीस'  से दुनिया को शांति का महत्व समझाने की कोशिश की, लेकिन आखिरी दिनों में वह अकेले पड़ गये. गांधी का जीवन भी कुछ ऐसा ही रहा.

अंतिम दिनों के गांधी का जीवन इसका प्रमाण है. गांधी का सर्वधर्म समभाव, संपत्ति के प्रति गांधी का अनासक्त भाव. कहा जाता है कि गांधी ने जिस 'सत्याग्रह' या अहिंसा को अपने जीवन और आंदोलन में प्रमुख औजार या हथियार बनाया, वह टॉलस्टॉय के विचारों से ही प्रेरित था. टॉलस्टॉय हमेशा कहते 'एक इंसान, दूसरे इंसान के लिए सबसे बड़ा उपहार है. किसी से झगड़ा नहीं करो. हिंसा का सहारा कभी नहीं लो. दूसरे को पीड़ा देने से अच्छा है कि खुद पीड़ा सहो. बिना दूसरे का नुकसान किये, बिना हिंसा का सहारा लिये, सामनेवाले का सामना करो.' गांधी और टॉलस्टॉय एक दूसरे के संपर्क में भी आये, तो इसी तरह की विचारधारा की बुनियाद थी.

टॉलस्टॉय ने एक किताब लिखी थी- 'द किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू.' गांधी ने इसी किताब को पढ़ने के बाद टॉलस्टॉय को पहला खत लिखा. उसके बाद दोनों के बीच पत्रों का दौर चला. गांधी के जीवन पर टॉलस्टॉय की इस किताब का बड़ा असर था. गांधीजी भी जीवन भर यही कहते थे कि सब एक समान हैं. सभी धर्म समान हैं. इंसान के अंदर ही भगवान हैं. गांधीजी टॉलस्टॉय से प्रभावित होकर उस रास्ते पर चलने की कोशिश करते रहे, लेकिन यह एकतरफा नहीं था. 

टॉलस्टॉय ने भी गांधी का 'हिंद स्वराज' पढ़ा. अक्सर भेजी जानेवाली चिट्ठियों को पढ़ा. दक्षिण अफ्रीका में गांधी के आंदोलन को जानने लगे, तो अपनी डायरी में गांधी का नाम बार-बार लिखते. जो टॉलस्टॉय से मिलने आते, उनसे भी वह गांधी की चर्चा करते. टॉलस्टॉय की मौत 1910 में हुई. 

उसी साल जीवन के अंतिम दौर में, सितंबर 1910 में टॉलस्टॉय ने गांधी को एक लंबी चिट्ठी लिखी. अपने एकाकीपन के दौर में. चिट्ठी का सार है- 'मैं अब मौत को करीब से देख रहा हूं. मैं कुछ जरूरी बातें कहना चाहता हूं. निष्क्रिय विरोध आज सबसे जरूरी कर्म है. यह एक तरीके से प्रेम का पाठ है. प्रेम ही इंसान के जीवन का सर्वोच्च नियम है. इसी प्रेम को तो दुनिया के सभी धर्मों के ज्ञानियों ने समझाया है. इस प्रेम में बल को कभी नहीं मिलाना चाहिए, नहीं तो वह हिंसा का रूप धारण कर लेता है...'. यह चिट्ठी लंबी है. यह एक अंश है. मरने से पहले टॉलस्टॉय गांधी को यह लंबी चिट्ठी लिखते हैं. 

उससे लगता है, अपने जीवन की इच्छा-आकांक्षा को वह गांधी में साकार होते देखना चाहते हैं. गांधी भी टॉलस्टॉय के जाने के बाद, उनके बताये मार्ग को निजी और सार्वजनिक जीवन का सूत्र ही बना लेते हैं. उनका सत्याग्रह भी एक तरीके से टॉलस्टॉय के कहे, इस वाक्य का विस्तार ही था कि 'निष्क्रिय विरोध आज सबसे जरूरी कर्म है, जिसमें किसी किस्म की हिंसा की मिलावट न हो.' संयोग देखिए कि टॉलस्टॉय की तरह गांधी भी अपने आखिरी दिनों में उसी तरह से अकेले पड़े, जैसे टॉलस्टॉय अकेले पड़ गये थे.

गांधी अपने जीवन के आखिरी दिनों में कैसे थे? इसे उनके साथ रहनेवालों ने लिखा है. प्यारेलाल ने लिखा है कि दिसंबर, 1947 में गांधी दुनिया के सबसे दुखी व्यक्ति थे. भारत के तत्कालीन भाग्यविधाता गांधी की उपेक्षा कर रहे थे. वह इससे वाकिफ थे. उन्होंने बंबई के अपने एक पुराने दोस्त जहांगीर पटेल को बुलाया. एक गोपनीय काम सौंपा. 

कहा, आप कराची जा कर वहां मेरे जाने का कार्यक्रम तय करिए. पटेल ने कहा कि इस माहौल में कराची में लोग आपको मार डालेंगे. गांधी ने कहा, अच्छे उद्देश्यों के लिए आत्मोसर्ग से बेहतर उपलब्धि दूसरी नहीं है, लेकिन पाकिस्तान जाने से पहले गांधी अपना घर ठीक करना चाहते थे. उन्होंने अंतिम उपवास किया. पाकिस्तान को पैसे देने, लोगों के मन में 'एका' के लिए गांधी ने अपना अंतिम उपवास 13 जनवरी को आरंभ किया. सत्ता संभाल रहे नेताओं में खेमेबंदी, देश में सांप्रदायिक झगड़े, भ्रष्टाचार और सत्ता हथियाने के ओछे हथकंडों से गांधी सिहर गये थे. उन्होंने इन सबके खिलाफ अपना सबसे कारगर अस्त्र इस्तेमाल किया. 

गांधी के इस निर्णय से डॉक्टर परेशान थे, लेकिन गांधी अडिग. डॉक्टरों के अनुसार उनका जीवन खतरे में था. बाद में दिल्ली में कलकत्ता की तरह हर समुदाय के लोग पश्चाताप की आग में जलते प्रायश्चित के लिए गांधी के सामने आने लगे. पूरा देश गांधी के लिए चिंतित हो गया. दंगाइयों ने फिर गांधी के सामने आत्मसमर्पण किया. गांधी की प्रार्थना सभाओं में कुरान का पाठ नियमित होता. 26 जनवरी, 1948 को गांधी ने स्वीकार किया कि आज मैं शायद सबसे अधिक निराश व्यक्ति हूं. 

फिर भी उस दिन वह कांग्रेस के लिए नये संविधान बनाने, देश में गरीबी दूर करने, गांवों के उत्थान के संबंध में विचार करते रहे. उस दिन पाकिस्तान से आये उनके एक अतिथि ने कहा कि वह तो उस दिन की प्रतीक्षा में हैं, जब गांधी शरणार्थी हिंदुओं-सिखों का 50 मील लंबा जुलूस लेकर हिंदुस्तान आयेंगे. पाकिस्तान से उनके मित्र जहांगीर पटेल लौट आये थे. जिन्ना गांधी को पाकिस्तान में बुलाने के लिए सहमत हो गये थे, लेकिन इस ख्वाहिश का हश्र क्या हुआ? पहले गांधी पर बम से आक्रमण, बाद में उन्हें गोली मार दी गयी.

गोली से गांधीजी की मृत्यु हो गयी, लेकिन मारे जाने से पहले, दुनिया से विदा होने से पहले नैराश्य के गहरे भाव के साथ जो बातें वह बार-बार कहते थे, वे गांधी के साथ खत्म नहीं हुईं. मारे जाने के 33 दिनों पहले उन्होंने पूछा- 'जब मैं अपनी आवाज उठाता हूं, तो सुनता कौन है?' 

गांधी जानते थे कि उनकी बात पहले की तरह नहीं सुनी जा रही, वह जानते थे कि उनकी बात को 'अरण्यरोदन' माना जा रहा है, फिर भी उन्होंने अपनी बात को कहना बंद नहीं किया. वे कहते थे- 'आज तो मेरी दीन हालत हो गयी है. 

एक जमाना था, जबकि मैंने कहा ऐसा होना चाहिए, तो हो जाता था. आज ऐसी बात नहीं रही. वह जमाना चला गया.' उस गुजरे जमाने को इस पर भी उन्होंने टिप्पणी की. कहा,' एक दिन था, जब गांधी को सब मानते थे, क्योंकि गांधी ने अंग्रेजों के साथ लड़ने का रास्ता बताया था. वे अंग्रेज भी कितने, केवल पौन लाख, पर उनके पास इतना सामान था, इतनी ताकत थी कि बकौल एनी बेसेंट, रोड़े का जवाब गोली से दिया जाता था. 

तब अहिंसा से काम बनता दीखता था, इसलिए उस समय गांधी की पूछ थी, पर आज लोग कहते हैं कि गांधी हमें रास्ता नहीं बता सकता है, इस वास्ते स्वरक्षा के लिए हमें शस्त्र हाथ में लेने चाहिए. उस समय हमको किसी ने एटम बम बनाना नहीं बताया था. अगर हम वह विद्या जानते होते, तो उसी से अंग्रेज को खत्म करने की सोचते, पर दूसरा कोई चारा नहीं था, तब मेरी बात मानी गयी और मेरा सिक्का जमा.'

(साभार : ’प्रार्थना प्रवचन’- महात्मा गांधी, राजकमल प्रकाशन)

गांधी किस मनः स्थिति में थे, यह दो अक्तूबर 1947 के प्रार्थना-प्रवचन में और साफ दिखता है. आजाद भारत के पहले और अपने जीवन के अंतिम जन्मदिन पर गांधी ने कहा-'आज तो मेरी जन्मतिथि है, लेकिन मेरे लिए तो आज मातम मनाने का दिन है. मैं आज तक जिंदा पड़ा हूं.

इस पर मुझ को खुद आश्चर्य होता है, शर्म लगती है, मैं वही शख्स हूं कि जिसकी जबान से एक चीज निकलती थी कि ऐसा करो, तो करोड़ों उसको मानते थे, पर आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है. मैं कहूं कि तुम ऐसा करो, 'नहीं, ऐसा नहीं करेंगे'- ऐसा कहते हैं. 

ऐसी हालत में हिंदुस्तान में मेरे लिए जगह कहां है और मैं उसमें जिंदा रहकर क्या करूंगा? आज मेरे से 125 वर्ष की बात छूट गयी है. 100 वर्ष की भी छूट गयी है और 10 वर्ष की भी. आज मैं 71वें वर्ष में तो पहुंच जाता हूं, लेकिन यह भी मुझ को चुभता है.'

(साभार : ’प्रार्थना प्रवचन’- महात्मा गांधी, राजकमल प्रकाशन)

वे मरने की इच्छा भी जाहिर करने लगे. उनकी इच्छा साफ शब्दों में झलकी. 'मैंने अपना आखिरी फैसला कर लिया है कि मैं भाई-भाई की लड़ाई में हिंदुस्तान की बरबादी देखने के लिए जिंदा नहीं रहना चाहता. मैं लगातार भगवान से प्रार्थना किया करता हूं कि हमारी इस पवित्र और सुंदर धरती पर इस तरह का कोई संकट आये, उसके पहले ही वह मुझे यहां से उठा ले. आप सब प्रार्थना में मेरा साथ दें'

(साभार : ’प्रार्थना प्रवचन’- महात्मा गांधी, राजकमल प्रकाशन)

गांधी ने फिर कहा- 'मैं तो कहता-कहता चला जाऊंगा, लेकिन किसी दिन मैं याद आऊंगा कि एक मिस्कीन आदमी जो कहता था, वही ठीक था.' या, बार-बार वही बात कहते रहने की अपनी विवशता में यह 'मैं, तो आज कल का ही मेहमान हूं. कुछ दिनों में यहां से चला जाऊंगा. पीछे आप याद किया करोगे कि बूढ़ा जो कहता था, वह सही बात है.'

(साभार : ’प्रार्थना प्रवचन’- महात्मा गांधी, राजकमल प्रकाशन)

गांधी सिर्फ बातों के जरिये ऐसा कह भर नहीं रहे थे. वे ऐसा कर भी रहे थे. आपसी तनाव रोकने और भाईचारा का रिश्ता बनाने के लिए उन्होंने आखिरी समय तक जो कोशिशें कीं, वे सब दर्ज हैं. देश में जहां-जहां नरसंहार होता, आगजनी होती, वहां सबसे पहले पहुंचनेवाले गांधी होते.

अनेकानेक प्रसंग हैं. नोआखली का प्रसंग तो सबसे चर्चित है. सात नवंबर, 1946 से दो मार्च, 1947 के बीच गांधी नोआखली के जिस गांव में जाते, वहां के लोग जो कुछ देते, वही खा लेते. भारत और पाकिस्तान के राजनेता सत्ता व कुरसी की दुनिया में रमे थे. 

उधर गांधी नोआखाली में एक नयी रोशनी तलाश रहे थे. नोआखली को उन्होंने अपना अंतिम बड़ा प्रयोग बताया था. यह प्रयोग था- भाईचारे-अपनेपन के उस रिश्ते को पुनर्जीवित करना, जो नोआखली की गलियों में हिंसा, उन्माद और पाशविक घटनाओं ने दफन कर दिया था. गांधी का मानना था कि इस रोशनी से पूरा देश प्रकाशमान होगा और हिंसक मानवीय इतिहास में एक नयी फिजां बनेगी.

गांधी के लिए 'ब्रह्मचर्य' एक व्रत था. अपनी दृढ़ता परखने के लिए उन्होंने कई प्रयोग किये. नोआखाली की यात्रा में गांधी को यह दर्द सालने लगा था कि उनके जीवन के सभी प्रयोग असफल हो रहे हैं. पाकिस्तान के बंटवारे का दर्द, लोगों की संवेदनहीनता और बढ़ते भ्रष्टाचार को देख कर उन्हें लगने लगा था कि देश एक अंधेरी सुरंग के मुहाने पर है. नोआखली में गांव-गांव गांधी जाते. जिस गांव में रात होती, वहीं ठहरते. एक रात मनु ने उठ कर देखा कि गांधी ठंड से बुरी तरह कांप रहे हैं. 

मनु ने उनकी मालिश की. झोपड़ी में जो भी कपड़े मिले, उनके ऊपर डाला, लेकिन गांधी की कंपकपी कम नहीं हुई. अंतत: मनु ने अपनी गोद में गांधी को सुलाया. निराश गांधी को दर्द झेलने के लिए उनके अपने लोगों ने अकेले छोड़ दिया था. मनु और गांधी के साथ सोने की बात से उन नेताओं की नैतिकता बोध को आघात पहुंचा, जो गांधी को सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल कर सत्ता पाने और बाद में सीढ़ी को अनुपयोगी मान हटाने से नहीं हिचके. गांधी ने खुले तौर से अपने इस प्रयोग के बारे में लिखा-कहा. उनका जीवन कहीं से व्यक्तिगत या गोपनीय था ही नहीं.

दिल्ली में बैठे नेता नोआखाली के दंगों से चिंतित नहीं हुए, लेकिन गांधी के इस प्रयोग में उन्हें 'विकृति' और 'पतन' की बू आयी. वे दिल्ली से दौड़ कर नोआखाली उन्हें समझाने पहुंचे. आभा को जब एक दंगाग्रस्त गांव में स्वतंत्र रूप से कार्य करने का गांधी ने आदेश दिया, तो उनके सहयोगियों ने इसका विरोध किया. जहां इंसान बर्बर हो गया है, वहां रात में एक युवा लड़की अकेले यात्रा व काम करेगी! 20 वर्ष की लड़की को आप अकेले कहां भेज रहे हैं?

गांधी ने जवाब दिया, आभा जायेगी. उसका एक बाल भी कोई स्पर्श नहीं करेगा. हुआ भी यही. आभा ने अकेले उन्मादग्रस्त गांवों में सफलतापूर्वक काम किया. यह वह समय था, जब अक्सर रात में बुदबुदाया करते थे, क्या करूं, क्या करूं?  मेरे चारों तरफ अंधेरा है. मुझे मालूम नहीं कि यह अंधकार कभी खत्म होगा या नहीं. मुझे कोई रोशनी नहीं दिखाई देती.

दरअसल, सत्ता की सियासत में लगे नेता और दूसरे लोग गांधी के बारे में तमाम किस्म की बातें दूर से कर रहे थे. जो गांधी को कोलकाता या नोआखली में काम करते देख रहे थे, वे चकित और हतप्रभ थे. 

गांधी की कार्यशैली के आगे नतमस्तक भी. नोआखली में गांधी के काम करने का तरीका अलग था. जनवरी या फरवरी 1947 का कोई दिन था. 76 वर्ष के गांधी अपने कुछ साथियों के साथ गांव-गांव, एक जगह से दूसरी जगह नंगे पांव घूम रहे थे. तब नोआखली के अलग-अलग 47 गांवों की उन्होंने यात्रा की. उनका प्रयास था कि नोआखली के हालात बदले. 

गांधी अपनी छोटी-सी टोली के साथ नोआखली गये, जहां बहुसंख्यक मुसलमान थे. उस टोली में गांधीजी के सचिव प्यारेलालजी की बहन सुशीला, एक जाने-माने डॉक्टर, सतीशदास गुप्ता और विद्वान निर्मल बोस भी थे. साथ ही गांधीजी की 19 वर्षीया नतिनी, नाती कनु गांधी और कनु की बंगाली पत्नी आभा थी. नोआखली में इस टोली का स्वागत करनेवाले या यूं कहें कि होस्ट की भूमिका में मोहम्मद इब्राहिम थे. फतेहपुर गांव के रहनेवाले. आठ जनवरी 1947 को गांधी उनके यहां ठहरे. 

24 जनवरी को मुरैन हबीउल्लाह पटवारी के यहां. उन दिनों नोआखली में गांधी जिनके मेहमान होते, उनमें अधिकतर बुनकर, मोची, मछुआरे जैसे समुदायों के लोग होते. मनु ने अपनी डायरी में लिखा कि ये लोग अपने स्नेह, आदर और त्याग की प्रबल भावना में स्नान कराते हुए हमें डुबो देते हैं. 23 जनवरी को डाल्टा गांव में गांधी एक धोबी राममोहन माली के आतिथ्य में रहे. 27 जनवरी को गांधी पल्ला गांव में एक बुनकर के घर ठहरे. वहां उन्होंने कहा, यह घर प्रेम और स्नेह से भरा है. यह घर बड़े-बड़े राजमहलों से, जहां प्रेम और स्नेह का राज नहीं होता, अत्यंत श्रेष्ठ है. 

हर दिन निर्मल बोस गांधी को सुबह में बंगला भाषा सिखाते- पढ़ाते. ठीक चार बजे या उससे पहले गांधी उठ जाते. वह पढ़ते या लिखते. केराेसीन से जलनेवाले लैंप या लालटेन की रोशनी में. फिर चरखा काटते. दो प्रार्थनाएं करते और फिर गांववालों के बीच, जहां वे ठहरते, स्वास्थ्य, साफ-सफाई, धूप स्नान, मिट्टी के लेप और इसके असर के बारे में बताते. मिट्टी का लेप कैसे माथे और पेट पर लगाने से लाभकारी होता है, यह बताते. बीमार बच्चे, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, बड़ी संख्या में, इस 'डॉक्टर गांधी' के पास पहुंचते.

कम लोग जानते हैं कि देश के महान लेखक, जिनकी छाप, दुनिया में है, उस प्रेमचंद ने भी स्वस्थ रहने का गुर गांधी से सीखा था. अद्भुत थे गांधी. यह उनके जीवन का अंतिम दौर था. देश तनाव, उन्माद और हिंसा में डूबा था. 

गांधी जिनका सब कुछ लुट गया था, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, उनके बीच होते. उन्हें तसल्ली देते. उनके आंसू पोंछते, पर साथ ही जीवन और आचार-व्यवहार के सुझाव भी देते. उनका पर्याप्त समय उन हिंदू औरतों के साथ भी गुजरता, जो भय से जड़ और स्तब्ध थीं. 

निर्मल बोस ने गौर किया कि गांधी बिल्कुल स्नेह और प्रेम से रोजाना ऐसे लोगों की बातें सुनते. अत्यंत नाजुक या संवेदनशील तौर-तरीके से एक-एक व्यक्ति को दुलारते, समझाते. उनकी पीड़ा के भागीदार बनते. यह महज सांत्वना नहीं थी. जिनकी दुनिया उजड़ गयी थी, उनके पास जाकर उन्हें सांत्वना देना, उनके दुख का हिस्सेदार बनना, यह असाधारण शौर्य भी था. 

गांधी ने दस जनवरी को जगतपुर में पीड़ित और रोती हुई औरतों को कहा- ये आंसू मरे हुए को वापस नहीं लायेंगे. जब औरतें लौट गयीं, तो गांधी ने मनु से कहा कि इन औरतों के चेहरे मेरे दिलोदिमाग में छाये हैं (हांट करते हैं). जब वे खाने गये, तो शाम को खा नहीं सके. सिर्फ गुड़ का एक धेला लिया. 

लगातार कई दिनों तक गांधी नोआखली घूमते रहे. आमतौर पर घास या दूब, जिस पर गांधी चलते, जिससे होकर गुजरते, वे नरम थे, पर एक शाम मनु ने देखा कि गांधी के तलवे कटे हुए हैं, जख्मी हैं, तो मनु ने आपत्ति की कि यह क्या हुआ बाबा? आप क्यों नंगे पांव चल रहे हैं? गांधी ने कहा कि हम मंदिरों में, मस्जिदों में, चर्चों में जूते पहनकर नहीं जाते. आज यहां इस पवित्र धरती पर, जहां लोगों ने अपने प्रियजनों को, अपना सर्वस्व खो दिया है, उस धरती पर हम नंगे पांव चल रहे हैं.  

आमतौर पर नोआखली में रोज घूमना होता. प्रार्थना संगीत के साथ शुरू होती. वैष्णवजन के साथ टैगोर की कविता- 'एकला चलो रे'. कभी-कभी गांधी मनु को कहते कि सही मुस्लिम होने की जो अवधारणा मुस्लिम धर्म में है, उससे वह काम शुरू करते हैं. गांधी की आवाज का स्तर या वोल्यूम मद्धिम होता, पर बात या टोन स्पष्ट व साफ. यह साथ चल रहे डीजी तेंदुलकर ने गौर किया. 

शादूल खलील गांव में एक अत्यंत प्रभावशाली मुस्लिम सलीमा साहा ने गांधी को चार फरवरी को अपनी जमीन पर प्रार्थना करवाने के लिए निमंत्रित किया. उन्होंने यह भी कहा कि वहां प्रार्थना में हिंदू धर्म के उद्धरण या राम के प्रति बातें कहीं जायेंगी, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है.

उस प्रार्थना सभा में राम के भजन भी गाये गये. गांधी ने उस गांव में कहा, जिस राम की मैं पूजा करता हूं, वे खुद भगवान हैं, जो ऐतिहासिक राम हैं, उनसे अलग. वे हमेशा थे, हैं और रहेंगे.

Advertisement

Comments

Advertisement