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vishesh aalekh

  • Jul 12 2019 8:15AM
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छूटती जाती आदिवासी जमीन

छूटती जाती आदिवासी जमीन

नेह अर्जुन इंदवार

इस दियों से आदिवासी समाज का सह-अस्तित्व वन पतराओं के साथ रहा है. जब कभी भी उनके जल-जंगल-जमीन को छीनने की कोशिश की गई, वह बहुत अशांत हो जाता है. झारखंडी चाहे असम, भोटांग (बंगाल), अंडमान या सुंदरवन गया, वह जल-जंगल-जमीन से हमेशा जुड़ा रहा. आदिवासियों ने असम और बंगाल के जंगल साफ करके चाय बागान बनाया था. 

वे चाय बागान के साथ अपनी खेतिहर जीविका को विस्तार देने के लिए भी जंगल साफ करके खेत-खलिहान बनाये. जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जिले के डुवार्स-तराई की वन-बस्ती में 1850 के दशक से ही आदिवासी खेती-किसानी करते आ रहे हैं. आज अधिकतर झारखंडी रेवेन्यू विलेज में ही बसते हैं. लेकिन सैकड़ों परिवार जंगल के साथ लगे फरेस्ट विलेज में भी रहते हैं.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने 21 राज्यों में वनभूमि क्षेत्र से उन परिवारों को हटाने का आदेश दिया, जिनके दावों को विभिन्न समर्थनयोग्य कागजात के अभाव में खारिज कर दिये गये थे. इस आदेश की जद में पश्चिम बंगाल के झारखंडी भी आ गये हैं. यह निर्विवाद तथ्य है कि आदिवासी समुदाय प्राचीन काल से ही वन अच्छादित क्षेत्रों में रहते रहे हैं और आजादी के बाद अमल में लाये गये कानूनों के तहत उन्हें अवैध निवासी कहा जा रहा है. शहरों और तमाम प्रशासनिक तामझाम से दूर रहने वाले समुदायों से किसी शहरी की तरह उनसे स्थानीय निवासी होने के प्रमाण-पत्र, दशकों पुराने रेवेन्यू और भूमि संबंधी सबूत मांगे जा रहे हैं. 

यदि उनके पास पर्याप्त भूमि और संसाधन होते तो वे क्यों नहीं अपने लिए मुकम्मल आवास और भोजन का प्रबंध करते. शहरों में सड़क के किनारे जीवन व्यतीत करने वाले और वन-बस्तियों के पास संपत्ति और संसाधन के नाम पर क्या होते हैं? यदि शहरों कीे मलिन बस्तियों को शहरी ढांचागत विकास और मानवीय आधार पर रेग्यूलेट की जाती है तो वन-पतरों के पास जीवन जीने वालों के साथ ऐसी मानवीय दृष्टिकोण क्यों नहीं अपनाया जा सकता है ?

झारखंडी आदिवासियों ने अपने अदम्य परिश्रम के बल पर जंगल को कृषि योग्य बनाया था और अधिकतर भूमि उनके कब्जे में थी. पूरा क्षेत्र मलेरिया के लिए कुख्यात था और उसे ‘मरघट’ क्षेत्र कहा जाता था. 

तब मलेरिया से बचाव का कोई इलाज नहीं था. तमाम प्रतिकूल परिस्थियों में हजारों लोगों को खोने के बावजूद आदिवासियों ने क्षेत्र को खेती लायक बनाया. आदिवासियों ने सैकड़ों स्थान यथा लोथाबाड़ी, सताली, चकियाभाटी, चखुआखाता, भरनोबाड़ी, रिनपनीया, बंदापानी, बंदरहाट आदि का नामकरण अपने हाथों किया था.

तब जीविका के भरपूर साधन थे. स्थानीय मूल निवासी बोड़ो, राभा आदि बागानों में चाकरी करना पसंद नहीं करते थे. उनके पास जीविकोपर्जन के लिए पर्याप्त जमीन और साधन थे. कम जनसंख्या के कारण वे अतिरिक्त भूमि और अन्य संसाधनों के अर्जन के प्रति बहुत उत्सुक भी नहीं थे.

उधर ब्रिटिश सरकार चाय बागान में काम करने के लिए झारखंड और अन्य क्षेत्रों से लगातार मजदूर ला रहे थे. इसके लिए कई कानून बने थे. खेतीबारी में दक्ष आदिवासी चाय बागानों के इतर खेती योग्य जमीन को अपने नाम करते गये. चांदी के सिक्कों से लैस आदिवासियों ने काफी जमीन खरीद ली थी. उनके पास इतनी जमीन थी कि वे स्थानीय भाषा में मोंडोल अर्थात् जमींदार के नाम से प्रसिद्ध हो गये. 

मदारीहाट के सलाह मोंडोल, बिरसा मोंडोल, बीरपाड़ा के पास के भगतपाड़ा के मंगलदास भगत मोंडोल, सताली बस्ती के विनोदबिहारी, चरवा मोंडोल, लोथाबाड़ी बस्ती के लाल एतवा मोंडोल, महादेव मोंडोल, बनचुकामारी के बिही मोंडोल, रंगाली बजना के बिरसा मोंडोल, क्रांति के कृष्ण भगत मोंडोल, गोपालपुर बागान के पास चपागुड़ी के हीरालाल भगत मोंडोल आदि सैकड़ों बड़े भू-स्वामी थे. अधिकतर मोंडोल के पास 100 बीघा से लेकर 4000 बीघा से भी अधिक जमीन थी. प्रायः सभी घोड़े की सवारी करते थे. कुछ के पास हाथी भी थे. आज के अलिपुरद्वार जिला शहर का आधा क्षेत्र बनचुकामारी के बिही मोंडोल की जमीन था. जब अंग्रेज घोड़ागाड़ी पर दौरा करते थे तब उनके पास इंपोर्टेड मोटर थी.

उन्होंने क्षेत्र के सार्वजनिक कार्यों के लिए विशाल भूमि दान में दी थी. लोथाबाड़ी हिंदी हाई स्कूल की जमीन लाल एतवा के दान में दी गयी थी. बीरपाड़ा (शहर) हाई स्कूल बनाने के लिए हीरालाल मोंडोल ने 75 बीघा जमीन दी थी. उन्होंने मोहनसिंह हाई स्कूल रंगाली बजना के लिए भी 49 बीघा जमीन दी. कई चाय बागानों को भी अपनी जमीन बेची. जमींदारों ने गांवों में सैकड़ों स्कूलों के लिए जमीन दी, जो बाद में सरकारी स्कूल बने.

ये जमींदार आम आदिवासियों की तरह ही सीधे-सादे हुआ करते थे. सामंतवादी व्यवहार सीखे नहीं थे. अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित होने के कारण सरकारी नियम कायदों से परिचित नहीं थे. शायद आदिवासी रक्त में घुले व्यवसाय विरोधी तत्व ने उन विशाल भूमि खंडों का व्यापारिक उपयोग करने से उन्हें रोक दिया था. वे चाहते तो वहां चाय बागान बना सकते थे. जानकारी की कमी और सादगी ने उन्हें दुनिया में आ रहे बदलाव को भांपने में साथ नहीं दिया.

1947 में पूर्वी पाकिस्तान बना. लाखों शरणार्थी क्षेत्र में आये. जनसंख्या-स्वरूप में बदलाव हुआ. 1971 में बंगालदेश बना और शरणार्थियों का हुजूम आकर क्षेत्र में फैल गये. भूमि और अन्य संसाधनों की मांग एकाएक बढ़ गयी.

उधर, 1977 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की नयी सरकार आयी. जून 1978 में बड़े खेतों को छोटे किसानों में बांटने का ‘ऑपरेशन बर्गादार’ शुरू हुआ. भूमि सुधार के इस ऑपरेशन को कानूनी रूप देने के लिए वामफ्रंट सरकार ने बंगाल लैंड होल्डिंग रिवेन्यू एक्ट 1979 लाया. इस कानून ने बड़े-बड़े जमींदारों में खलबली मचा दी. दो वर्षों तक राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किया. 

दक्षिण बंगाल के चालाक जमींदारों ने इसका लाभ उठाया और जमीन बचाने में कामयाब रहे. अशिक्षित आदिवासी मोंडोलों को इस बारे कुछ भी जानकारी नहीं थी. यह कानून 14 अप्रैल 1981 में लागू हुआ तो एक परिवार के नाम 8 एकड़ (24 बीघी) जमीन छोड़ कर सभी भूमि को सरकार ने अपने कब्जे में कर लिया. 

आदिवासी मोंडोलों पर यह एक सर्जिकल स्ट्राइक थी, कठिन परिश्रम से तैयार की गयी करीबन 50 हजार एकड़ आदिवासी भूमि एकबारगी छीन ली गयी.

20 फरवरी 2019 के सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी आदिवासी समुदायों के लिए किसी बम विस्फोट से कम नहीं था. कोर्ट के इस आदेश ने सभी को सकते में डाल दिया है. लोग विभिन्न आदिवासी संगठनों के तले आंदोलन के लिए इकट्टा हो रहे हैं.

फॉरेस्ट राईट के नाम पर अनेक संगठन आदिवासी कल्याण के लिए दशकों से काम कर रहे हैं. इन संगठनों के पदाधिकारी विदेश में भी आवाज उठाते हैं. वे दक्षिण बंगाल के जमींदारों की तरह कानूनों की कमजोरी का फायदा नहीं उठा सके. वे चाहते तो सुप्रीम कोर्ट में चल रहे इस मामले पर कैवियट दायर करके एक पक्ष बन कर अपनी बात रख सकते थे, लेकिन ऐसा करने में वे असफल रहे. केंद्र सरकार के वकील भी सुनवाई में नहीं पहुंचे, लेकिन यदि आदिवासी संगठन जागरूक होते तो शायद इस तरह का एकपक्षीय निर्णय नहीं आता.

आदिवासी जल जमीन और जंगल की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं. फॉरेस्ट एक्ट में अपने दावे के सबूत में आदिवासी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके, जबकि वे सदियों से वहां रहते हैं. उनके पास कानूनी कागजात नहीं है. जल-जमीन-जंगल का विशाल बाजार मूल्य होता है. आदिवासी उससे बेखबर हैं. बाजार के दाव-पेंच उन्हें समझ में नहीं आते. इन जंगलों में बेहिसाब दौलत छुपी हुई है जिसे आदिवासी पहचान नहीं पाते हैं. लेकिन बिजनेस वालों की नजरें उसे तुरंत ताड़ लेती हैं.

डुवार्स तराई के हजारों आदिवासी परिवारों जंगल से विस्थापित होने की स्थिति में हैं. वहीं चाय बागान के मजदूर जिन घरों में सौ-डेढ़-सौ वर्षों से रहते आ रहे हैं, उनका आवासीय पट्टा अधिकार उनके पास नहीं है. वे कई सालों से पट्टा-अधिकार की मांग सरकार कर रहे हैं, लेकिन अब तक सरकार इस मामले में चुप है. 

दूसरी ओर पड़ोसी देशों से आने वाले लोंगों को सरकार भूमि पट्टा का वितरण कर रही है. आदिवासी जमीन रोज लूट रही है. नये-नये एसटी बने लोग धड़ल्ले से आदिवासी भूमि को हस्तांतरित करने में लगे हुए हैं. आदिवासियों को नियम-कानून और बाजार के दांव-पेंच की कोई जानकारी नहीं है. अन्याय होने पर वे सिर्फ रैली करके आवाज उठा सकते हैं. ऐसा लगता है, आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन की लड़ाई तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक कि वे कानून और बाजार को मुकम्मल रूप से न समझ लें.

 
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